मेरे झूठे तर्क तुम्हारे उजले सत्य की सारे
सारा बोझा बंद आँखों में उतारकर झील के उस किनारे का इंतजार तरंग उछलते कंकड ढूँढे न अब कोई प्रश्न नाही उत्तर की दरकार मेरा होना भी एक भूल लागे जब नयन समक्ष दर्पण मन का निहारे झूठे पैबंद से फट्टे आवरण तिनके कितनी बार दोहराव दुशाला ताने