सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

कथा फलक जिंदगी का लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्रेम की बुनाई

और मुझे अच्छा लगा , तुम्हारा यह पूछना  मैं कैसी हूँ और दर्पण ने मुस्कुराकर  जान लिया  ये सौंदर्य सादगी में बुना  जिम्मेदारियों की टोकरी बोझ  , नहीं   उसकी  बैंबू  से  बनाई  गई   प्रेम  की  बुनाई  थी अलस्सुबह  से  शाम तक का पूरा सफर कहानी  हकीकत  की  थी सपने  के रंग जिन पर चढ़े थे उसी कोमलता की लिलाई लिए  जैसे  नर्म स्फोट  खुलते  पल्लव  पात जैसे  माँ  बाजार  से  लाए  गए  गेंहूँ  को धोती थी और  निथरने  के  लिए  उस  टोकरी  में  रख  देती  थी वैसे  ही  उसको  देखना   प्रेम  के  आँचल  की   झलकारी सी   लिलाई  ,   उसके  प्रत्येक  कार्य  में   मिल  जायेगी और  आज उसकी  यह  आभा  अपने  लिए  और  भी  सुंदर  लग रही है जो  दुनिया  मैं...

तुम्हारे सुंदर सपने है

हर  हार  को  जीत  का  रुप  दे  देती  हो जितनी  सहजता  से  तुम  सबका ध्यान रख लेती हो उतनी  सहजता  की  मांग  है , अपने  खोए  सपनों  को पूरा करो रास्ते पर चलते समय लोग  क्या  सोचेंगे , क्या सोच रहे  है ये  कभी भी तुम्हारे  प्रश्न नहीं रहे है ,  इनसे  प्रभावित होना

किराने की दुकान तक

जब तब और अब के बीच का सफर किराने  की  दुकान  तक  जाना मेरे  और  तुम्हारे  संदर्भों  में  अलग-अलग  होते  है बचपन  मैं   लालायित  रहता है बालमन  ,  मनाहीं  में   किशोरमन तरुणाई  में  अदद  रौब  हम  अब  बच्चे नहीं अकेले  जा सकते है , दोस्त के साथ  जायेंगे स्कूटर  बाइक  भी  तो  है   तभी  दो  दिन  का  अंतराल अरे  माँ , भैया को  कहे  दो  या श्यामा  को   कह  दो  , हमारे  पास  समय  नहीं  है 

हम कठपुतली

हमें  अपने  बचपन  की  याद  तभी आती  है । जबकि   बचपन   बीत  गया  होता  है ।। कितना   कुछ    बदल   जाता  है । और   जो   बदल   ना   सके    वो   जिंदगी   जिंदगी    नहीं ।।

सुबह भोर उठती है

सुबह  भोर  उठती  है सर्दी - गरमी  चाहे  जैसे  दिन  हो खाने  बनाने बर्तन  माँज कपड़े धोती झाडू   ले  बहुराती  आंगन पोछा  मार  फर्श  चमकाती कोनों - कोनों का  रखती ध्यान समय  की  चौकसी  में पूरा  करती  सारे  प्रबंध  रखती  सबकी  पसंद - नापसंद  का  ध्यान  भक्ति  की  भावना  में  डूबी  करती  ईश आराधन

मीठी बारिश

अम्बर   तले    छाँव   नील    गगन   में  बादल    गुजरे    ,   मेरी    छोटी    गुड़िया  प्यारी     करे    देख    उन्हें    इशारा  बताओ    तो    मम्मी    जरा    इनमें  कौन    छिपा  ?   किस   की   है   रुई    सी     मुलायम    सवारी  कौन     सवार    होकर    इन ण धीमी -  धीमी   गाड़ियों   से   जाता  है ?   वह     किधर   ,   कहाँ    जाता   ?  क्या     वो     हमको    झाँकता   है  ?  हमसे    मिलने    को    वो    क्यों    नहीं  नीचे    आ...

जब सफर में ...

शुरु  - शुरु  में  थोड़ा  मुश्किल  था  पर  मन  था  शुरुआत  हो  ही  गई । हालिक  अभी भी  झिझक  गई  नही  है  ,  यह  मन का  अजीब  द्वंद्व  है  जहाँ  इसे  नयी  दिशाओं  की  तलाश  भी  है  और   एक  तरफ   नहीं   की  जकड़न  से   बंधा  बार  -  बार   पीछे  को  खींचा  चला  जाता  है  ,  पर  अब   जब   सफर  में   निकलने  के  लिए  पहला  कदम  रख  ही  दिया  है   तो  ठीक  है  ...  कुछ  सीखने  को  ही  मिलेगा   । मेरा  यूट्यूब  चैनल  -   Nature feel of soul  

जनपथ बहुराती

संकेत संकेतक कभी शुभ समाचार की कभी किसी अनहोनी अनिष्ट की दोनों ही रहस्य भविष्य के गर्भ में छिपे है जिसको उस त्रिकालदर्शी के सिवा मैंने क्या किसी ने भी नहीं देखा , तो सुख- दुख के तराजू बराबर है दिन के बाद रात, रात के बाद दिन कोई बाधा नहीं , फिर अस्वीकार कैसा

अनेकों शुभकामनाएँ वेणु

वेणु अपनी गति की चाल तेज कर पूरे दमखम के साथ रोड़ के किनारे किनारे चली जा रही है । हम्म…काफी देर जो हो गई है । पहले दिन ही लेट कैसे चलेगा ….सोचती हुई अपने पैरों से रास्ते को और जल्दी जल्दी नापने लग जाती है । जैसे कि उसे किसी मैराथन में दौड़ लगानी है , क्या लगा रही है , हालाकि इस रास्ते का भी उसे लिहाज रखना है अतः अब जैसे भी हो किसी तरह समय पर पहुँचना है । ये लो संगीत नाट्य कला अकादमी का केंद्र नजर आ गया और जिसे देख वेणु को कुछ