संदेश

मंजिल तुम हमारी

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मायने रखती है तुम्हारी खुद की खुशी  तुम्हारी  अप्रतिबंधित मुस्कान  उफ , खिलखिलाकर  हँसना  जरुरत है जिंदगी की बंदगी उतनी  ही  जितनी मौत जीवन को स्वीकार्य है पाथर तो  नहीं , पाथर पर भी

चिलबिल

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चिलबिल सी आतुर निडर आजाद उन्मुक्त  उड़ान  देर तक हवा में डोलती रही किसी दिन देखा मैंने उसे मिट्टी के अंक में अंकुए पात खिले हुए  मुस्कुराती हुई  नवनीत सम पल्लव को हिलाती हुई ।

माटी के मोल

एक बालपन कपोल दंतविहीन जरा हुआ  प्रथम क्रीड़ा तोतली अब मजदूरी की हंसी प्रकृति अद्भुत  द्रवित हृदय विदारा विश्रांत भी उसी ममतामय छाँव तले

कभी तुमसे इंकार

कोरे कागज की निःशब्द  भाषा टकटकी   बाँधे कुछ लिखने को कहती है सुख - दुख , आशा - निराशा राग - विराग , तृष्णा और तोष वीर ओज सहृदय माधुर्य  प्रेमभाव पल्लवित ऋतुनय

हैप्पी होली

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रंग  बहार  जिंदगी हँसी  खुशी  सब तुम्हारे  साथ  सदा  दुओं  में रंगीन  रहे  बदरा जीवन  उत्सव  नव  नूतन  बयार  रिमझिम  बौछार  फूलों  सी  महक निर्दोष  चहक

जन्मदिन मुबारक हो प्रियंका

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सोचती हूँ  कि फिर एक बार  छोटी हो जाओ  नहीं  बनना बड़ा  , हमारा बचपन  ही  था भला पर  जिस  गाड़ी  पर  हम  बैठे  है  रुकती  ही  नहीं मुझे  मुड़कर  देख  मुस्काना  होता  है  यादों  की  चाँदनी  रात  में टिमटिमाते  सितारों  को देखना होता है कैसे होती थी सुबह  स्कूल  जाने  को  सुहानी  सुबह

संदर्भ की जरुरत न पड़ती

शून्य  की  संवेदनाएँ  सच्ची  होती  है साथ  चलती  हुई   दुआओं   में दीये  की   पीली   रोशनी  सी अपने  विश्वास  का  उत्सव  मनाती    कभी  बिफरने  नहीं  देती   परस्पर   एक  -  दूजे   का  यह  प्रेम समय  सरगम  की  गहरी  थाह  है संदर्भ  की  जरुरत  नहीं  पड़ती  किसी  भी  छोर  से  वो  बात   शुरु  कर  दे  , सुनने  में  उसे  देर  न  लगती बंसी   सजाकर   मधुर   राग  से  पूरक  बनती

अपनी हँसी

एक प्याली  चाय और  तुम्हारी  हँसी अपनी  हँसी  ... सोती  जागती  भागती  जिंदगी के  बीच   एक  स्त्री  की   हँसी  वह  रिक्त  कोना  जहाँ   अक्सर  अपने जिम्मेदारियों  का  बीहड़  उगाते  रहते  है और  तुम उसे  बड़ी  सफाई कलात्मक  रुचि के साथ  काँटती - छाँटती  बगिया   बनाने में  पूरा दम  भर देती  हूँ  ।

मेरे झूठे तर्क तुम्हारे उजले सत्य की सारे

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सारा   बोझा   बंद   आँखों   में   उतारकर झील   के    उस   किनारे   का   इंतजार तरंग    उछलते   कंकड   ढूँढे    न    अब कोई   प्रश्न   नाही   उत्तर   की    दरकार  मेरा   होना   भी  एक   भूल   लागे   जब नयन    समक्ष   दर्पण   मन   का   निहारे झूठे   पैबंद   से   फट्टे    आवरण   तिनके कितनी    बार    दोहराव    दुशाला  ताने