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बदरा

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बारिश

बारिश की बूँदें भीगती - भीगाती घर में एक अबोध चंचला बच्ची की तरह घुसी चली आई है उसके लिए सबकुछ जाना - पहचाना था दीवारें , लाॅन की घास गमले में लगे पौधे  बरामदे की गली से सटा मिट्टी का गोल चबूतरा और क्यारियाँ उनमें हँसते और झूमते - गाते नन्हे - नन्हे से रंग - बिरंगें फूल और  हरियाली । वहीं  किनारे दीवार से सटा पाइप लगा है जिससे छत्त का सारा पानी जिस वेग और आवाज के साथ नीचे  उतर रहा है लगता है कि पानी के निकास के लिए बनाई गई नाली के जगह पर ईट लगा दी जाये तो  बच्चों के लिए खासा स्विमिंग पूल तैयार हो जायेगा।  जैसाकि छोटे में अक्सर हम सब बच्चे बारिश मे किया करते थे दो - दो घंटें तक पानी में खेलते रहते थे नीचे नदिया ऊपर बारिश की मेहरबानी पर शायद ही हमें दो घंटें से ज्यादा पानी में रहने दिया जाता था क्योंकि इसके बाद  सबकी मम्मी बारी - बारी से सबको आवाज लगाती की अब उतर आओ नीचे , बहुत भीग चुके जल्दी से नीचे आकर दो लोटा साफ पानी डालकर  कपड़े बदल लो पर बच्चे तो बच्चे और बारिश तो बारिश जब तक  कोई ऊपर आकर हमारे बनाए गए तालाब को देखना लेता और बदले में...

और चलते जाना

जो मन न करे तो क्या करे इस तंगहाल जिंदगी की  ओर ध्यान  किस कदर ले जाए  , हालातों का मारा बेवजह का यात्री वर्तमान की  सच्चाईयाँ - वह 

प्रेम की बुनाई

और मुझे अच्छा लगा , तुम्हारा यह पूछना  मैं कैसी हूँ और दर्पण ने मुस्कुराकर  जान लिया  ये सौंदर्य सादगी में बुना  जिम्मेदारियों की टोकरी बोझ  , नहीं   उसकी  बैंबू  से  बनाई  गई   प्रेम  की  बुनाई  थी अलस्सुबह  से  शाम तक का पूरा सफर कहानी  हकीकत  की  थी सपने  के रंग जिन पर चढ़े थे उसी कोमलता की लिलाई लिए  जैसे  नर्म स्फोट  खुलते  पल्लव  पात जैसे  माँ  बाजार  से  लाए  गए  गेंहूँ  को धोती थी और  निथरने  के  लिए  उस  टोकरी  में  रख  देती  थी वैसे  ही  उसको  देखना   प्रेम  के  आँचल  की   झलकारी सी   लिलाई  ,   उसके  प्रत्येक  कार्य  में   मिल  जायेगी और  आज उसकी  यह  आभा  अपने  लिए  और  भी  सुंदर  लग रही है जो  दुनिया  मैं...

तुम्हारे सुंदर सपने है

हर  हार  को  जीत  का  रुप  दे  देती  हो जितनी  सहजता  से  तुम  सबका ध्यान रख लेती हो उतनी  सहजता  की  मांग  है , अपने  खोए  सपनों  को पूरा करो रास्ते पर चलते समय लोग  क्या  सोचेंगे , क्या सोच रहे  है ये  कभी भी तुम्हारे  प्रश्न नहीं रहे है ,  इनसे  प्रभावित होना

शुभप्रभात

जहाँ  से  समय  होकर  निकलता  है वहाँ  देहरी  के  द्वार  दो   टेक  अँखिया द्वंद्व  निर्वतमान   अपने  सपने  बुनती आसमान  के  प्रांगण  में  नीलिमा  की  जादुई   ,   चहक भरे  बक्से का पिटारा आज  अभी  अब  से   शेष  प्रश्नों   के  

मोबाइल पर बहुत कुछ अच्छा भी होता है

 सौजन्य  : दूरदर्शन झारखंड मन  मंदिर  प्रभु  का  सुंदर  धाम भक्ति  की  पावन  ज्योत  अभिराम तम  की कारा से  करती  जो  मुक्त  तुम  संघर्ष   की  अमिट  गाथा वीरता  प्रेम  की  अमित भाषा दया  स्नेह   से  पुलक  वत्सल सुप्त  न  अब  खोए  , यूँ  सोये  रहो प्रात उदित  नवजीवन की  बेला यूँ खिलती रेशों  रेशों  , धानों  धानों  छिटक  तिनके अंक भर अपने प्रात लेती ,  हिये की संवेदी निकृष्ट विचार न  मैल  रहे  ,  आत्मशोधन की  दीप वर्तिका मन मंदिर चलो मिलकर प्रज्ज्वलित करे ।