संदेश

माँ

माँ का नाम ही काफी है हर पीड़ा और मुश्किल से बाहर निकलने के लिए मेरी चोट का मरहम माँ ही तो है  सबसे प्यारी हमेशा मेरी ही चिंता में घुलने वाली माँ  देखती हूँ जो तेरा प्यार  मैं  भी  बड़ी बच्ची  तेरी स्नेह  छाँव  में  ही  हर पल  जीवन का गुजारु अभिलाषा मन की , वरदान ईश से और क्या ही मांगू  बस  तुमको  ही  चाहूँ  , तुम्हारा ममताभरा स्पर्श  मीठे स्वर तुम्हारा साथ , तुम्हारा लहराता स्निगध आँचल और ढ़ेर सारा प्यार ।

किराने की दुकान तक

जब तब और अब के बीच का सफर किराने  की  दुकान  तक  जाना मेरे  और  तुम्हारे  संदर्भों  में  अलग-अलग  होते  है बचपन  मैं   लालायित  रहता है बालमन  ,  मनाहीं  में   किशोरमन तरुणाई  में  अदद  रौब  हम  अब  बच्चे नहीं अकेले  जा सकते है , दोस्त के साथ  जायेंगे स्कूटर  बाइक  भी  तो  है   तभी  दो  दिन  का  अंतराल अरे  माँ , भैया को  कहे  दो  या श्यामा  को   कह  दो  , हमारे  पास  समय  नहीं  है 

अनबुझ फिर भी

स्पष्ट है चुप है ताना - बाना उछलती गेंद  घूरती आँख टेसू के लाल फूल  धूप में जलता ग्लोब  निर्मोह बनी अँखिया अपनी - अपनी कहानियों में डूबी हुई  उलझे हुए धागे उनकी उलझी हुई गाँठें दोनों छोर व्यथित टूटे जिंदगी की सीढ़ी ऊपर - नीचे , नीचे - ऊपर

मंजिल तुम हमारी

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मायने रखती है तुम्हारी खुद की खुशी  तुम्हारी  अप्रतिबंधित मुस्कान  उफ , खिलखिलाकर  हँसना  जरुरत है जिंदगी की बंदगी उतनी  ही  जितनी मौत जीवन को स्वीकार्य है पाथर तो  नहीं , पाथर पर भी

चिलबिल

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चिलबिल सी आतुर निडर आजाद उन्मुक्त  उड़ान  देर तक हवा में डोलती रही किसी दिन देखा मैंने उसे मिट्टी के अंक में अंकुए पात खिले हुए  मुस्कुराती हुई  नवनीत सम पल्लव को हिलाती हुई ।

माटी के मोल

एक बालपन कपोल दंतविहीन जरा हुआ  प्रथम क्रीड़ा तोतली अब मजदूरी की हंसी प्रकृति अद्भुत  द्रवित हृदय विदारा विश्रांत भी उसी ममतामय छाँव तले

कभी तुमसे इंकार

कोरे कागज की निःशब्द  भाषा टकटकी   बाँधे कुछ लिखने को कहती है सुख - दुख , आशा - निराशा राग - विराग , तृष्णा और तोष वीर ओज सहृदय माधुर्य  प्रेमभाव पल्लवित ऋतुनय

हैप्पी होली

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रंग  बहार  जिंदगी हँसी  खुशी  सब तुम्हारे  साथ  सदा  दुओं  में रंगीन  रहे  बदरा जीवन  उत्सव  नव  नूतन  बयार  रिमझिम  बौछार  फूलों  सी  महक निर्दोष  चहक

जन्मदिन मुबारक हो प्रियंका

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सोचती हूँ  कि फिर एक बार  छोटी हो जाओ  नहीं  बनना बड़ा  , हमारा बचपन  ही  था भला पर  जिस  गाड़ी  पर  हम  बैठे  है  रुकती  ही  नहीं मुझे  मुड़कर  देख  मुस्काना  होता  है  यादों  की  चाँदनी  रात  में टिमटिमाते  सितारों  को देखना होता है कैसे होती थी सुबह  स्कूल  जाने  को  सुहानी  सुबह