संदर्भ की जरुरत न पड़ती
शून्य की संवेदनाएँ सच्ची होती है साथ चलती हुई दुआओं में दीये की पीली रोशनी सी अपने विश्वास का उत्सव मनाती कभी बिफरने नहीं देती परस्पर एक - दूजे का यह प्रेम समय सरगम की गहरी थाह है संदर्भ की जरुरत नहीं पड़ती किसी भी छोर से वो बात शुरु कर दे , सुनने में उसे देर न लगती बंसी सजाकर मधुर राग से पूरक बनती