चिलबिल
आजाद उन्मुक्त उड़ान
देर तक हवा में डोलती रही
किसी दिन देखा मैंने उसे
मिट्टी के अंक में अंकुए पात खिले हुए
मुस्कुराती हुई नवनीत सम पल्लव को हिलाती हुई ।
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