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माँ

माँ का नाम ही काफी है हर पीड़ा और मुश्किल से बाहर निकलने के लिए मेरी चोट का मरहम माँ ही तो है  सबसे प्यारी हमेशा मेरी ही चिंता में घुलने वाली माँ  देखती हूँ जो तेरा प्यार  मैं  भी  बड़ी बच्ची  तेरी स्नेह  छाँव  में  ही  हर पल  जीवन का गुजारु अभिलाषा मन की , वरदान ईश से और क्या ही मांगू  बस  तुमको  ही  चाहूँ  , तुम्हारा ममताभरा स्पर्श  मीठे स्वर तुम्हारा साथ , तुम्हारा लहराता स्निगध आँचल और ढ़ेर सारा प्यार ।

किराने की दुकान तक

जब तब और अब के बीच का सफर किराने  की  दुकान  तक  जाना मेरे  और  तुम्हारे  संदर्भों  में  अलग-अलग  होते  है बचपन  मैं   लालायित  रहता है बालमन  ,  मनाहीं  में   किशोरमन तरुणाई  में  अदद  रौब  हम  अब  बच्चे नहीं अकेले  जा सकते है , दोस्त के साथ  जायेंगे स्कूटर  बाइक  भी  तो  है   तभी  दो  दिन  का  अंतराल अरे  माँ , भैया को  कहे  दो  या श्यामा  को   कह  दो  , हमारे  पास  समय  नहीं  है 

अनबुझ फिर भी

स्पष्ट है चुप है ताना - बाना उछलती गेंद  घूरती आँख टेसू के लाल फूल  धूप में जलता ग्लोब  निर्मोह बनी अँखिया अपनी - अपनी कहानियों में डूबी हुई  उलझे हुए धागे उनकी उलझी हुई गाँठें दोनों छोर व्यथित टूटे जिंदगी की सीढ़ी ऊपर - नीचे , नीचे - ऊपर