और मुझे अच्छा लगा , तुम्हारा यह पूछना मैं कैसी हूँ और दर्पण ने मुस्कुराकर जान लिया ये सौंदर्य सादगी में बुना जिम्मेदारियों की टोकरी बोझ , नहीं उसकी बैंबू से बनाई गई प्रेम की बुनाई थी अलस्सुबह से शाम तक का पूरा सफर कहानी हकीकत की थी सपने के रंग जिन पर चढ़े थे उसी कोमलता की लिलाई लिए जैसे नर्म स्फोट खुलते पल्लव पात जैसे माँ बाजार से लाए गए गेंहूँ को धोती थी और निथरने के लिए उस टोकरी में रख देती थी वैसे ही उसको देखना प्रेम के आँचल की झलकारी सी लिलाई , उसके प्रत्येक कार्य में मिल जायेगी और आज उसकी यह आभा अपने लिए और भी सुंदर लग रही है जो दुनिया मैं...
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