किराने की दुकान तक


जब तब और अब के बीच का सफर

किराने  की  दुकान  तक  जाना

मेरे  और  तुम्हारे  संदर्भों  में 

अलग-अलग  होते  है

बचपन  मैं   लालायित  रहता है

बालमन  ,  मनाहीं  में   किशोरमन

तरुणाई  में  अदद  रौब  हम  अब  बच्चे नहीं

अकेले  जा सकते है , दोस्त के साथ  जायेंगे

स्कूटर  बाइक  भी  तो  है  

तभी  दो  दिन  का  अंतराल

अरे  माँ , भैया को  कहे  दो  या

श्यामा  को   कह  दो  , हमारे  पास  समय  नहीं  है 

चलो  बात  का  क्या  कहना  ?   

और  हाँ  शायद  , तुम्हें   पता  है  या नहीं

देखा  है या  नहीं  

किराने की  दुकान  तक  का  

एक  और  सफर  तय  होता  है 

हाथ  में  झोला  लिए  

पैदल  आने - जाने  तक  का सफर

ग्यारह  नबंर  की  सवारी  

और  उकताते  दिन  की  

तब्दीली  का   बहाने  लिए  हुए ।



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