संदर्भ की जरुरत न पड़ती

शून्य  की  संवेदनाएँ  सच्ची  होती  है

साथ  चलती  हुई   दुआओं   में

दीये  की   पीली   रोशनी  सी

अपने  विश्वास  का  उत्सव  मनाती   

कभी  बिफरने  नहीं  देती  

परस्पर   एक  -  दूजे   का  यह  प्रेम

समय  सरगम  की  गहरी  थाह  है

संदर्भ  की  जरुरत  नहीं  पड़ती 

किसी  भी  छोर  से  वो  बात  

शुरु  कर  दे  , सुनने  में  उसे  देर  न  लगती

बंसी   सजाकर   मधुर   राग  से  पूरक  बनती

टिप्पणियाँ

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शनिवार 14 फरवरी, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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  2. आपकी पंक्तियाँ पढ़कर मन शांत हो जाता है। आपने शून्य को जिस तरह संवेदनाओं से जोड़ा है, वह मुझे बहुत गहरा लगा। मैं दीये की पीली रोशनी वाली छवि साफ महसूस कर सकता हूँ। आप प्रेम को स्थिर और मजबूत ताकत की तरह सामने रखते हो, जो रिश्तों को बिखरने नहीं देती।

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