माटी के मोल
एक बालपन कपोल दंतविहीन जरा हुआ प्रथम क्रीड़ा तोतली अब मजदूरी की हंसी प्रकृति अद्भुत द्रवित हृदय विदारा विश्रांत भी उसी ममतामय छाँव तले
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