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प्रेम की बुनाई



और मुझे अच्छा लगा , तुम्हारा यह पूछना  मैं कैसी हूँ

और दर्पण ने मुस्कुराकर  जान लिया 

ये सौंदर्य सादगी में बुना 

जिम्मेदारियों की टोकरी बोझ  , नहीं  

उसकी  बैंबू  से  बनाई  गई   प्रेम  की  बुनाई  थी

अलस्सुबह  से  शाम तक का पूरा सफर

कहानी  हकीकत  की  थी

सपने  के रंग जिन पर चढ़े थे

उसी कोमलता की लिलाई लिए 

जैसे  नर्म स्फोट  खुलते  पल्लव  पात

जैसे  माँ  बाजार  से  लाए  गए  गेंहूँ  को धोती थी

और  निथरने  के  लिए  उस  टोकरी  में  रख  देती  थी

वैसे  ही  उसको  देखना   प्रेम  के  आँचल  की   झलकारी

सी   लिलाई  ,   उसके  प्रत्येक  कार्य  में   मिल  जायेगी

और  आज उसकी  यह  आभा  अपने  लिए  और  भी  सुंदर  लग रही है

जो  दुनिया  मैं  सबसे  सुंदर   स्त्री  है 

घर - बाहर  और  अपने  में   सच्चाई  के  साथ  पगी  हुई ।


टिप्पणियाँ

  1. यह रचना बहुत कोमल और आत्मीय भाव लिए हुए है। आपने स्त्री के सौंदर्य को बाहरी रूप से नहीं, बल्कि उसके प्रेम, जिम्मेदारियों और सच्चाई से जोड़ा है, और यही बात दिल को छू जाती है। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.

    अधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
    धन्यवाद!

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    1. धन्यवाद एडिमन जी ! इतनी सुंदर और भावों में गूँथी प्रतिक्रया व्यक्त कर रचना को मान देने और चलते रहने की प्रेरणा का वाहक बनने के लिए हृदय से आभार व स्वागत ।

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