सुबह भोर उठती है
सुबह भोर उठती है
सर्दी - गरमी चाहे जैसे दिन हो
खाने बनाने
बर्तन माँज
कपड़े धोती
झाडू ले बहुराती आंगन
पोछा मार फर्श चमकाती
कोनों - कोनों का रखती ध्यान
समय की चौकसी में
पूरा करती सारे प्रबंध
रखती सबकी पसंद - नापसंद का ध्यान
कुछ समय खाली समय
लग जाती है सिलाई मशीन में
कोई संगीत बजाती
मशीन की घरघराहट में
हरे कृष्ण हरे राम गाती
तन्मय कुछ सपने सिलती जाती
कढ़ाई करती
चादर झालर मेजपोश
सजावट के सामान तैयार कर
सुख पाती
बच्चों के स्कूल से लौटने पर
बच्चों की चहक में फरमाइशी पकवान
बनाती उनका होमवर्क पूरा कराती
और नये - जमाने की पढ़ाई में उलझी गणित बैठाती
सूर्यास्त पूर्व वह पूरा आंगन
कूचे से फिर बहुराती
पानी भरकर
दीप जलाती
तुलसी मैया के सम्मुख शीश नवाती
और सबकी पसंद - नापसंद ध्यान कर
खाना पकाती
पहली - आखिरी रोटी गाय - कुत्ते को देती
सब परिवार को खाना खिलाकर बर्तन माँजती
बर्तन माँज चौका साफ कर
वह सबसे आखिर में खुद खाती
अलग से फिर कुछ ज्याद न पकाती
सबके सो जाने के बाद ही
खुद की पलकें झपकाती
और स्वप्नलोक में भी नित्य
कर्म की कुशलता दिखलाती
तब वह आराम पाती
भोर चार बजे ही उठ जाती ।

सुंदर मनोहारी सृजन
जवाब देंहटाएंआम स्त्री के जीवन को सही उकेरा है | सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंब्लॉग पर आकर रचना पर अपनी मूल्यवान प्रतिक्रियाएँ साझा करने के लिए हृदय से धन्यवाद ! आप सभी का ब्लॉग पर सदैव स्वागत है ।
जवाब देंहटाएंभोर से रात तक बिना थके, बिना शिकायत के वह सबका ध्यान रखती है, फिर भी खुद सबसे पीछे रह जाती है। उसकी भक्ति, मेहनत और सपनों को आपने बहुत सरल और सच्चे शब्दों में पिरोया है।
जवाब देंहटाएंसच स्त्री आज भी अपना सुख अपने परिवार के सुख में ही ढूँढा करती है । ब्लॉग पर आपका स्वागत है ।
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