धूप की महक


धूप की महक  

हवा में आती

खिड़कियों के  

बंद किवाड खोल

अस्त - व्यस्त से

घर को जगाती

तपिश आँसू की

बदली छटती हुई 

बंसत की बहार  

जल्द अपने पीले

रंग - बिरंगें फूलों 

के शबनम झूलों

में झूलता बाग 

कोकिल मधुर गान गाए

सुरभि पोर हर्षित  

खेतों में शस्यशयामला  

लहराए मिट्टी की महक 

गुमसुम चहक वापस

लेकर नदी किनारे जाए 

दो क्षण नही , दिनभर

घास पर चलते जाए 

तुम्हारी एक मुस्कान  

और मेरा दिन बन जाए 

धूप रोज यही कहकर जाए


टिप्पणियाँ

  1. आपकी रचना का शीर्षक बहुत प्यारा लगा। सरल,सहज, कोमल-सी रचना।
    सादर।
    -----
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १६ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  2. और इस गुनगुनी धूप में
    हर किसी का
    बैठने को मन दिल चाहे..
    वसंत आए !

    बधाई!

    जवाब देंहटाएं

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