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बाल कविता

बारिश



बारिश की बूँदें भीगती - भीगाती घर में एक अबोध चंचला बच्ची की तरह घुसी चली आई है उसके लिए सबकुछ जाना - पहचाना था दीवारें , लाॅन की घास गमले में लगे पौधे  बरामदे की गली से सटा मिट्टी का गोल चबूतरा और क्यारियाँ उनमें हँसते और झूमते - गाते नन्हे - नन्हे से रंग - बिरंगें फूल और  हरियाली । वहीं  किनारे दीवार से सटा पाइप लगा है जिससे छत्त का सारा पानी जिस वेग और आवाज के साथ नीचे  उतर रहा है लगता है कि पानी के निकास के लिए बनाई गई नाली के जगह पर ईट लगा दी जाये तो  बच्चों के लिए खासा स्विमिंग पूल तैयार हो जायेगा।

 जैसाकि छोटे में अक्सर हम सब बच्चे बारिश मे किया करते थे दो - दो घंटें तक पानी में खेलते रहते थे नीचे नदिया ऊपर बारिश की मेहरबानी पर शायद ही हमें दो घंटें से ज्यादा पानी में रहने दिया जाता था क्योंकि इसके बाद  सबकी मम्मी बारी - बारी से सबको आवाज लगाती की अब उतर आओ नीचे , बहुत भीग चुके जल्दी से नीचे आकर दो लोटा साफ पानी डालकर  कपड़े बदल लो पर बच्चे तो बच्चे और बारिश तो बारिश जब तक  कोई ऊपर आकर हमारे बनाए गए तालाब को देखना लेता और बदले में  डाट न पड़ जाती किसी का नीचे उतरना होता ही नहीं था । अब तो बस याद है अक्सर बारिश में आयी ही जाती है और मन उन्हीं बचपन की खुशियों में खो जाता है इस बारिश में भींगता उस बचपन की राह को पकड़ लेता है वो चालक और  हम उसके सवार बस ले चलो उसी छत पर उसी बारिश के पास। 

बारिश  की  बूँदों  में  भीग  जाये  अंतस  सारा

यहीं  आज  मिल  जाए  वो  बीता बचपन  चहका - चहका  

बरसात के वे कजरारे मेघा

उमड़ - घुमड़  कर  बरसे   छमाछम  

गीत और बाल  कलरव  का  वह  मधुर  स्वर  आज फिर गूँजा ..


टिप्पणियाँ

  1.  आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 06 जुलाई, 2026 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in  पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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  2. बचपन की भीगी भीगी यादें

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  3. वाह!!!
    बचपन की यादें ताजा कर दी आपने...
    बहुत सुन्दर ..लाजवाब।

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    उत्तर
    1. स्वागत है सुधा जी !
      हर बारिश में मन उन्हीं बीते दिनों में खींचा चला जाता है ।

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