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संदेश

प्रेम की बुनाई

और मुझे अच्छा लगा , तुम्हारा यह पूछना  मैं कैसी हूँ और दर्पण ने मुस्कुराकर  जान लिया  ये सौंदर्य सादगी में बुना  जिम्मेदारियों की टोकरी बोझ  , नहीं   उसकी  बैंबू  से  बनाई  गई   प्रेम  की  बुनाई  थी अलस्सुबह  से  शाम तक का पूरा सफर कहानी  हकीकत  की  थी सपने  के रंग जिन पर चढ़े थे उसी कोमलता की लिलाई लिए  जैसे  नर्म स्फोट  खुलते  पल्लव  पात जैसे  माँ  बाजार  से  लाए  गए  गेंहूँ  को धोती थी और  निथरने  के  लिए  उस  टोकरी  में  रख  देती  थी वैसे  ही  उसको  देखना   प्रेम  के  आँचल  की   झलकारी सी   लिलाई  ,   उसके  प्रत्येक  कार्य  में   मिल  जायेगी और  आज उसकी  यह  आभा  अपने  लिए  और  भी  सुंदर  लग रही है जो  दुनिया  मैं...

तुम्हारे सुंदर सपने है

हर  हार  को  जीत  का  रुप  दे  देती  हो जितनी  सहजता  से  तुम  सबका ध्यान रख लेती हो उतनी  सहजता  की  मांग  है , अपने  खोए  सपनों  को पूरा करो रास्ते पर चलते समय लोग  क्या  सोचेंगे , क्या सोच रहे  है ये  कभी भी तुम्हारे  प्रश्न नहीं रहे है ,  इनसे  प्रभावित होना

शुभप्रभात

जहाँ  से  समय  होकर  निकलता  है वहाँ  देहरी  के  द्वार  दो   टेक  अँखिया द्वंद्व  निर्वतमान   अपने  सपने  बुनती आसमान  के  प्रांगण  में  नीलिमा  की  जादुई   ,   चहक भरे  बक्से का पिटारा आज  अभी  अब  से   शेष  प्रश्नों   के  

मोबाइल पर बहुत कुछ अच्छा भी होता है

 सौजन्य  : दूरदर्शन झारखंड मन  मंदिर  प्रभु  का  सुंदर  धाम भक्ति  की  पावन  ज्योत  अभिराम तम  की कारा से  करती  जो  मुक्त  तुम  संघर्ष   की  अमिट  गाथा वीरता  प्रेम  की  अमित भाषा दया  स्नेह   से  पुलक  वत्सल सुप्त  न  अब  खोए  , यूँ  सोये  रहो प्रात उदित  नवजीवन की  बेला यूँ खिलती रेशों  रेशों  , धानों  धानों  छिटक  तिनके अंक भर अपने प्रात लेती ,  हिये की संवेदी निकृष्ट विचार न  मैल  रहे  ,  आत्मशोधन की  दीप वर्तिका मन मंदिर चलो मिलकर प्रज्ज्वलित करे ।

जब कभी यूँही सही

हँसी की तलाश लौट आओ भीतर है खोज लाओ मुढ़ भाव को छोड़कर  तनिक मार्ग पर तो आओ कुछ बात है दिल की बेझिझक  कह जाओ ,  सुनेंगे  चुपचाप  घंटें - दो घंटे  चाहे जितनी लंबी हो बात  दो शब्द या  केवल मौन  कुछ  भी प्रश्न  नहीं  खड़े  करेंगे ,  स्वत्व  बोध  की नव परिभाषा गढेंगे

माँ

माँ का नाम ही काफी है हर पीड़ा और मुश्किल से बाहर निकलने के लिए मेरी चोट का मरहम माँ ही तो है  सबसे प्यारी हमेशा मेरी ही चिंता में घुलने वाली माँ  देखती हूँ जो तेरा प्यार  मैं  भी  बड़ी बच्ची  तेरी स्नेह  छाँव  में  ही  हर पल  जीवन का गुजारु अभिलाषा मन की , वरदान ईश से और क्या ही मांगू  बस  तुमको  ही  चाहूँ  , तुम्हारा ममताभरा स्पर्श  मीठे स्वर तुम्हारा साथ , तुम्हारा लहराता स्निगध आँचल और ढ़ेर सारा प्यार ।

किराने की दुकान तक

जब तब और अब के बीच का सफर किराने  की  दुकान  तक  जाना मेरे  और  तुम्हारे  संदर्भों  में  अलग-अलग  होते  है बचपन  मैं   लालायित  रहता है बालमन  ,  मनाहीं  में   किशोरमन तरुणाई  में  अदद  रौब  हम  अब  बच्चे नहीं अकेले  जा सकते है , दोस्त के साथ  जायेंगे स्कूटर  बाइक  भी  तो  है   तभी  दो  दिन  का  अंतराल अरे  माँ , भैया को  कहे  दो  या श्यामा  को   कह  दो  , हमारे  पास  समय  नहीं  है 

अनबुझ फिर भी

स्पष्ट है चुप है ताना - बाना उछलती गेंद  घूरती आँख टेसू के लाल फूल  धूप में जलता ग्लोब  निर्मोह बनी अँखिया अपनी - अपनी कहानियों में डूबी हुई  उलझे हुए धागे उनकी उलझी हुई गाँठें दोनों छोर व्यथित टूटे जिंदगी की सीढ़ी ऊपर - नीचे , नीचे - ऊपर

मंजिल तुम हमारी

मायने रखती है तुम्हारी खुद की खुशी  तुम्हारी  अप्रतिबंधित मुस्कान  उफ , खिलखिलाकर  हँसना  जरुरत है जिंदगी की बंदगी उतनी  ही  जितनी मौत जीवन को स्वीकार्य है पाथर तो  नहीं , पाथर पर भी

चिलबिल

चिलबिल सी आतुर निडर आजाद उन्मुक्त  उड़ान  देर तक हवा में डोलती रही किसी दिन देखा मैंने उसे मिट्टी के अंक में अंकुए पात खिले हुए  मुस्कुराती हुई  नवनीत सम पल्लव को हिलाती हुई ।

माटी के मोल

एक बालपन कपोल दंतविहीन जरा हुआ  प्रथम क्रीड़ा तोतली अब मजदूरी की हंसी प्रकृति अद्भुत  द्रवित हृदय विदारा विश्रांत भी उसी ममतामय छाँव तले

कभी तुमसे इंकार

कोरे कागज की निःशब्द  भाषा टकटकी   बाँधे कुछ लिखने को कहती है सुख - दुख , आशा - निराशा राग - विराग , तृष्णा और तोष वीर ओज सहृदय माधुर्य  प्रेमभाव पल्लवित ऋतुनय

हैप्पी होली

रंग  बहार  जिंदगी हँसी  खुशी  सब तुम्हारे  साथ  सदा  दुओं  में रंगीन  रहे  बदरा जीवन  उत्सव  नव  नूतन  बयार  रिमझिम  बौछार  फूलों  सी  महक निर्दोष  चहक

जन्मदिन मुबारक हो प्रियंका

सोचती हूँ  कि फिर एक बार  छोटी हो जाओ  नहीं  बनना बड़ा  , हमारा बचपन  ही  था भला पर  जिस  गाड़ी  पर  हम  बैठे  है  रुकती  ही  नहीं मुझे  मुड़कर  देख  मुस्काना  होता  है  यादों  की  चाँदनी  रात  में टिमटिमाते  सितारों  को देखना होता है कैसे होती थी सुबह  स्कूल  जाने  को  सुहानी  सुबह

संदर्भ की जरुरत न पड़ती

शून्य  की  संवेदनाएँ  सच्ची  होती  है साथ  चलती  हुई   दुआओं   में दीये  की   पीली   रोशनी  सी अपने  विश्वास  का  उत्सव  मनाती    कभी  बिफरने  नहीं  देती   परस्पर   एक  -  दूजे   का  यह  प्रेम समय  सरगम  की  गहरी  थाह  है संदर्भ  की  जरुरत  नहीं  पड़ती  किसी  भी  छोर  से  वो  बात   शुरु  कर  दे  , सुनने  में  उसे  देर  न  लगती बंसी   सजाकर   मधुर   राग  से  पूरक  बनती

अपनी हँसी

एक प्याली  चाय और  तुम्हारी  हँसी अपनी  हँसी  ... सोती  जागती  भागती  जिंदगी के  बीच   एक  स्त्री  की   हँसी  वह  रिक्त  कोना  जहाँ   अक्सर  अपने जिम्मेदारियों  का  बीहड़  उगाते  रहते  है और  तुम उसे  बड़ी  सफाई कलात्मक  रुचि के साथ  काँटती - छाँटती  बगिया   बनाने में  पूरा दम  भर देती  हूँ  ।

मेरे झूठे तर्क तुम्हारे उजले सत्य की सारे

सारा   बोझा   बंद   आँखों   में   उतारकर झील   के    उस   किनारे   का   इंतजार तरंग    उछलते   कंकड   ढूँढे    न    अब कोई   प्रश्न   नाही   उत्तर   की    दरकार  मेरा   होना   भी  एक   भूल   लागे   जब नयन    समक्ष   दर्पण   मन   का   निहारे झूठे   पैबंद   से   फट्टे    आवरण   तिनके कितनी    बार    दोहराव    दुशाला  ताने

वासंती हवा

  इन वासंती हवाओं के टूटे पत्ते बुलाते रास्ते पर आज भी मिल जायेंगे  उसी ताजगी के एहसास को लिए भोर में  अपनी महक को घोलते हुए कलियों के पहरुए वे कपोलें नव पिछली बार देखे थे  अभी वे कितने ही प्रतीक्षित  न जाने कौन इतना लंबा बीता समय चुप अपने में मुझे - तुम्हे   आते - जाते बनते - मिटते अफसाने शोर और खामोशियों के बीच का पूल किनारे पर उग आई धूप और 

हम कठपुतली

हमें  अपने  बचपन  की  याद  तभी आती  है । जबकि   बचपन   बीत  गया  होता  है ।। कितना   कुछ    बदल   जाता  है । और   जो   बदल   ना   सके    वो   जिंदगी   जिंदगी    नहीं ।।

धूप की महक

धूप की महक   हवा में आती खिड़कियों के   बंद किवाड खोल अस्त - व्यस्त से घर को जगाती तपिश आँसू की बदली छटती हुई  बंसत की बहार   जल्द अपने पीले