संदेश

जन्मदिन मुबारक हो प्रियंका

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सोचती हूँ  कि फिर एक बार  छोटी हो जाओ  नहीं  बनना बड़ा  , हमारा बचपन  ही  था भला पर  जिस  गाड़ी  पर  हम  बैठे  है  रुकती  ही  नहीं मुझे  मुड़कर  देख  मुस्काना  होता  है  यादों  की  चाँदनी  रात  में टिमटिमाते  सितारों  को देखना होता है कैसे होती थी सुबह  स्कूल  जाने  को  सुहानी  सुबह

संदर्भ की जरुरत न पड़ती

शून्य  की  संवेदनाएँ  सच्ची  होती  है साथ  चलती  हुई   दुआओं   में दीये  की   पीली   रोशनी  सी अपने  विश्वास  का  उत्सव  मनाती    कभी  बिफरने  नहीं  देती   परस्पर   एक  -  दूजे   का  यह  प्रेम समय  सरगम  की  गहरी  थाह  है संदर्भ  की  जरुरत  नहीं  पड़ती  किसी  भी  छोर  से  वो  बात   शुरु  कर  दे  , सुनने  में  उसे  देर  न  लगती बंसी   सजाकर   मधुर   राग  से  पूरक  बनती

अपनी हँसी

एक प्याली  चाय और  तुम्हारी  हँसी अपनी  हँसी  ... सोती  जागती  भागती  जिंदगी के  बीच   एक  स्त्री  की   हँसी  वह  रिक्त  कोना  जहाँ   अक्सर  अपने जिम्मेदारियों  का  बीहड़  उगाते  रहते  है और  तुम उसे  बड़ी  सफाई कलात्मक  रुचि के साथ  काँटती - छाँटती  बगिया   बनाने में  पूरा दम  भर देती  हूँ  ।

मेरे झूठे तर्क तुम्हारे उजले सत्य की सारे

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सारा   बोझा   बंद   आँखों   में   उतारकर झील   के    उस   किनारे   का   इंतजार तरंग    उछलते   कंकड   ढूँढे    न    अब कोई   प्रश्न   नाही   उत्तर   की    दरकार  मेरा   होना   भी  एक   भूल   लागे   जब नयन    समक्ष   दर्पण   मन   का   निहारे झूठे   पैबंद   से   फट्टे    आवरण   तिनके कितनी    बार    दोहराव    दुशाला  ताने

वासंती हवा

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  इन वासंती हवाओं के टूटे पत्ते बुलाते रास्ते पर आज भी मिल जायेंगे  उसी ताजगी के एहसास को लिए भोर में  अपनी महक को घोलते हुए कलियों के पहरुए वे कपोलें नव पिछली बार देखे थे  अभी वे कितने ही प्रतीक्षित  न जाने कौन इतना लंबा बीता समय चुप अपने में मुझे - तुम्हे   आते - जाते बनते - मिटते अफसाने शोर और खामोशियों के बीच का पूल किनारे पर उग आई धूप और 

हम कठपुतली

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हमें  अपने  बचपन  की  याद  तभी आती  है । जबकि   बचपन   बीत  गया  होता  है ।। कितना   कुछ    बदल   जाता  है । और   जो   बदल   ना   सके    वो   जिंदगी   जिंदगी    नहीं ।।

धूप की महक

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धूप की महक   हवा में आती खिड़कियों के   बंद किवाड खोल अस्त - व्यस्त से घर को जगाती तपिश आँसू की बदली छटती हुई  बंसत की बहार   जल्द अपने पीले

उस खत को मेरा शुक्रिया ..!

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खत लिखना है मुझे अपनी नादानियों नासमझी बेवकूफियों का जिन पर जमाना हमेशा से हँसता आया उन  शर्तिया  पसंद - नापसंद उलाहनों  का 

सुबह भोर उठती है

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सुबह  भोर  उठती  है सर्दी - गरमी  चाहे  जैसे  दिन  हो खाने  बनाने बर्तन  माँज कपड़े धोती झाडू   ले  बहुराती  आंगन पोछा  मार  फर्श  चमकाती कोनों - कोनों का  रखती ध्यान समय  की  चौकसी  में पूरा  करती  सारे  प्रबंध  रखती  सबकी  पसंद - नापसंद  का  ध्यान  भक्ति  की  भावना  में  डूबी  करती  ईश आराधन

बच्चों के लिए

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👉  बाँकी बाँकी धूप   

पृथिवीसूक्त

सत्यं  बृहदृतमुग्रं  दीक्षा  तपो  ब्रह्म  यज्ञः  पृथिवीं  धारयन्ति । सा  नो  भूतस्य  भव्यस्य  पत्न्युरुं  लोकं  पृथिवी  नः ।।  संदर्भ -  अथर्ववेद  12 वाँ  काण्ड  प्रथम  सूक्त   दृष्टा ऋषि  अथर्वा   देवी  भूमि  ।

फेरीवाला और नन्हीं गुडियाँ

फेरी   वाला     बेचता   सामान नन्हीं   -    नन्हीं     गुड़ियाँ उसकी    बाबुल    की     मेहमान     साँवरी     गोरी     पहने   लाल गुलाबी    केसरिया    पीला   नीला हरा   धानी     घाघरा  -   चोली

योग और आप

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खुश  रहिए  खुश  रहेंगे  तो  नकरात्मक  नेगेटिव  एनर्जी   दूर  होगी  और  आपके  भीतर  और  बाहर  की  दुनिया  में  एक  खुशमिज़ाज पाॅजिटिव  एनर्जी  का  घेरा  तैयार  होगा  जो  आपके  मेंटल हेल्थ  को  संतुलित  बनाए  रखने  में  मददगार  होगा  और  आपकी  शारीरिक कार्य  करने  की  क्षमता  में  भी  एक  खास  स्फूर्ति   दिखाई  देगी ।

पतझड़ का पत्ता

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हवा का बहाव भरा झोंका टहिनयों से झरते पीले सूखे पते मरते नही है , तुम रोना मत उन्हें यूँ देख न खुद को किसी उदासी में डुबोना न उन्मलान होना , क्या तुम जानते हो ये टूटते पत्ते कपोल से पल्लव कोमल थे सुरमई लाल फिर होते - होते धानी पहने चोला हरित बारिश में झूम - झूमकर भीगे है 

पहाड़ी ढलान पर से

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पहाड़ी  ढलान   पर   से सरकता   सांझ   का   वक्त गुलाबी  लाल  से  सुरमाई बादल सूरज  का   गोलाकार   रुप प्रत्यक्ष  सीधे   अब  जाते - जाते ज्यों  आँखें  मीचे  गीत  कोई  पहाड़ी  गाता  धुन  वो  जीवन की   सुनाता    बंद  तरानों को  बरसो  छेड़े  कोई  अपना याद  आता   अग्नि  की  ऊष्म पोरे  -  मिलकर  बोले   साँवरे यहीं  कही  बंसी  बजाता । 👉  कनेर

राष्ट्रीय ई पुस्तकालय से

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राष्ट्रीय-e पुस्तकालय  👉 डाॅ० ए० पी० जे० अब्दुल कलाम   

शरद की मीठी गुनगुनी धूप

शरद की मीठी गुनगुनी धूप  एक आँगन की याद दिलाती है खिली हुई धूप  ऊन के गोले और तेजी सी चलती हुई सिलाईयाँ दादी नानी माँ बुआ बेटी चाची बड़ीमम्मी और भाभी सब साथ संग मेरे पड़ोसवाली सहेली पूरी भरी गोष्ठी लगते हुनर के पैबंद  रंगीन धागों से तैयार  क्रोशिया की झालर

इबादत जो देखी है

अपलक नयन तीरे एक अकूल तट विमल    सपतरंग सप्तपर्ण प्रतिबिंब खिलते शतदल कमल फैला हुआ विस्तृत क्षितिज  ठन गई है बात खुदा से

विश्व में अटल सत्य के चिरवास का .!

ओ !  इतिहास   की  घड़ियाँ  चुप   खड़ा   निस्तब्ध  क्या  तूने  पहने  ली  बेड़ियाँ  अचंभा  में  पड़ा शून्य  को  तकता निर्जन  में  अकेला  जर्जर  वृध्द  ? परिवर्तन  की  आंधियाँ बदल  देती  है  कितना  कुछ

मीठी बारिश

अम्बर   तले    छाँव   नील    गगन   में  बादल    गुजरे    ,   मेरी    छोटी    गुड़िया  प्यारी     करे    देख    उन्हें    इशारा  बताओ    तो    मम्मी    जरा    इनमें  कौन    छिपा  ?   किस   की   है   रुई    सी     मुलायम    सवारी  कौन     सवार    होकर    इन ण धीमी -  धीमी   गाड़ियों   से   जाता  है ?   वह     किधर   ,   कहाँ    जाता   ?  क्या     वो     हमको    झाँकता   है  ?  हमसे    मिलने    को    वो    क्यों    नहीं  नीचे    आ...