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शब्द मौन अपनी बारीकियाँ बुन रहे है अपनी कमियों को झाँक रहे है अपनी सुंदरता पर कहीं वे इतरा रहे है कुछ इठला रहे है निरंतर बन और बिगड़ रहे है नदिया की आवेशित धारा यमुना बनी अष्टमी की व्याकुल और मचलती प्रतीत हो रही है बही जा रही है बंधनों के पार उसका आवेग उत्ताल आज व्यक्त होने को है ।