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योग और आप

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खुश  रहिए  खुश  रहेंगे  तो  नकरात्मक  नेगेटिव  एनर्जी   दूर  होगी  और  आपके  भीतर  और  बाहर  की  दुनिया  में  एक  खुशमिज़ाज पाॅजिटिव  एनर्जी  का  घेरा  तैयार  होगा  जो  आपके  मेंटल हेल्थ  को  संतुलित  बनाए  रखने  में  मददगार  होगा  और  आपकी  शारीरिक कार्य  करने  की  क्षमता  में  भी  एक  खास  स्फूर्ति   दिखाई  देगी ।

पतझड़ का पत्ता

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हवा का बहाव भरा झोंका टहिनयों से झरते पीले सूखे पते मरते नही है , तुम रोना मत उन्हें यूँ देख न खुद को किसी उदासी में डुबोना न उन्मलान होना , क्या तुम जानते हो ये टूटते पत्ते कपोल से पल्लव कोमल थे सुरमई लाल फिर होते - होते धानी पहने चोला हरित बारिश में झूम - झूमकर भीगे है 

पहाड़ी ढलान पर से

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पहाड़ी  ढलान   पर   से सरकता   सांझ   का   वक्त गुलाबी  लाल  से  सुरमाई बादल सूरज  का   गोलाकार   रुप प्रत्यक्ष  सीधे   अब  जाते - जाते ज्यों  आँखें  मीचे  गीत  कोई  पहाड़ी  गाता  धुन  वो  जीवन की   सुनाता    बंद  तरानों को  बरसो  छेड़े  कोई  अपना याद  आता   अग्नि  की  ऊष्म पोरे  -  मिलकर  बोले   साँवरे यहीं  कही  बंसी  बजाता । 👉  कनेर

राष्ट्रीय ई पुस्तकालय से

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राष्ट्रीय-e पुस्तकालय  👉 डाॅ० ए० पी० जे० अब्दुल कलाम   

शरद की मीठी गुनगुनी धूप

शरद की मीठी गुनगुनी धूप  एक आँगन की याद दिलाती है खिली हुई धूप  ऊन के गोले और तेजी सी चलती हुई सिलाईयाँ दादी नानी माँ बुआ बेटी चाची बड़ीमम्मी और भाभी सब साथ संग मेरे पड़ोसवाली सहेली पूरी भरी गोष्ठी लगते हुनर के पैबंद  रंगीन धागों से तैयार  क्रोशिया की झालर

इबादत जो देखी है

अपलक नयन तीरे एक अकूल तट विमल    सपतरंग सप्तपर्ण प्रतिबिंब खिलते शतदल कमल फैला हुआ विस्तृत क्षितिज  ठन गई है बात खुदा से

विश्व में अटल सत्य के चिरवास का .!

ओ !  इतिहास   की  घड़ियाँ  चुप   खड़ा   निस्तब्ध  क्या  तूने  पहने  ली  बेड़ियाँ  अचंभा  में  पड़ा शून्य  को  तकता निर्जन  में  अकेला  जर्जर  वृध्द  ? परिवर्तन  की  आंधियाँ बदल  देती  है  कितना  कुछ

मीठी बारिश

अम्बर   तले    छाँव   नील    गगन   में  बादल    गुजरे    ,   मेरी    छोटी    गुड़िया  प्यारी     करे    देख    उन्हें    इशारा  बताओ    तो    मम्मी    जरा    इनमें  कौन    छिपा  ?   किस   की   है   रुई    सी     मुलायम    सवारी  कौन     सवार    होकर    इन ण धीमी -  धीमी   गाड़ियों   से   जाता  है ?   वह     किधर   ,   कहाँ    जाता   ?  क्या     वो     हमको    झाँकता   है  ?  हमसे    मिलने    को    वो    क्यों    नहीं  नीचे    आ...

जब सफर में ...

शुरु  - शुरु  में  थोड़ा  मुश्किल  था  पर  मन  था  शुरुआत  हो  ही  गई । हालिक  अभी भी  झिझक  गई  नही  है  ,  यह  मन का  अजीब  द्वंद्व  है  जहाँ  इसे  नयी  दिशाओं  की  तलाश  भी  है  और   एक  तरफ   नहीं   की  जकड़न  से   बंधा  बार  -  बार   पीछे  को  खींचा  चला  जाता  है  ,  पर  अब   जब   सफर  में   निकलने  के  लिए  पहला  कदम  रख  ही  दिया  है   तो  ठीक  है  ...  कुछ  सीखने  को  ही  मिलेगा   । मेरा  यूट्यूब  चैनल  -   Nature feel of soul