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संदर्भ की जरुरत न पड़ती

शून्य  की  संवेदनाएँ  सच्ची  होती  है साथ  चलती  हुई   दुआओं   में दीये  की   पीली   रोशनी  सी अपने  विश्वास  का  उत्सव  मनाती    कभी  बिफरने  नहीं  देती   परस्पर   एक  -  दूजे   का  यह  प्रेम समय  सरगम  की  गहरी  थाह  है संदर्भ  की  जरुरत  नहीं  पड़ती  किसी  भी  छोर  से  वो  बात   शुरु  कर  दे  , सुनने  में  उसे  देर  न  लगती बंसी   सजाकर   मधुर   राग  से  पूरक  बनती

अपनी हँसी

एक प्याली  चाय और  तुम्हारी  हँसी अपनी  हँसी  ... सोती  जागती  भागती  जिंदगी के  बीच   एक  स्त्री  की   हँसी  वह  रिक्त  कोना  जहाँ   अक्सर  अपने जिम्मेदारियों  का  बीहड़  उगाते  रहते  है और  तुम उसे  बड़ी  सफाई कलात्मक  रुचि के साथ  काँटती - छाँटती  बगिया   बनाने में  पूरा दम  भर देती  हूँ  ।

हम कठपुतली

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हमें  अपने  बचपन  की  याद  तभी आती  है । जबकि   बचपन   बीत  गया  होता  है ।। कितना   कुछ    बदल   जाता  है । और   जो   बदल   ना   सके    वो   जिंदगी   जिंदगी    नहीं ।।

सुबह भोर उठती है

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सुबह  भोर  उठती  है सर्दी - गरमी  चाहे  जैसे  दिन  हो खाने  बनाने बर्तन  माँज कपड़े धोती झाडू   ले  बहुराती  आंगन पोछा  मार  फर्श  चमकाती कोनों - कोनों का  रखती ध्यान समय  की  चौकसी  में पूरा  करती  सारे  प्रबंध  रखती  सबकी  पसंद - नापसंद  का  ध्यान  भक्ति  की  भावना  में  डूबी  करती  ईश आराधन

पृथिवीसूक्त

सत्यं  बृहदृतमुग्रं  दीक्षा  तपो  ब्रह्म  यज्ञः  पृथिवीं  धारयन्ति । सा  नो  भूतस्य  भव्यस्य  पत्न्युरुं  लोकं  पृथिवी  नः ।।  संदर्भ -  अथर्ववेद  12 वाँ  काण्ड  प्रथम  सूक्त   दृष्टा ऋषि  अथर्वा   देवी  भूमि  ।

योग और आप

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खुश  रहिए  खुश  रहेंगे  तो  नकरात्मक  नेगेटिव  एनर्जी   दूर  होगी  और  आपके  भीतर  और  बाहर  की  दुनिया  में  एक  खुशमिज़ाज पाॅजिटिव  एनर्जी  का  घेरा  तैयार  होगा  जो  आपके  मेंटल हेल्थ  को  संतुलित  बनाए  रखने  में  मददगार  होगा  और  आपकी  शारीरिक कार्य  करने  की  क्षमता  में  भी  एक  खास  स्फूर्ति   दिखाई  देगी ।

पतझड़ का पत्ता

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हवा का बहाव भरा झोंका टहिनयों से झरते पीले सूखे पते मरते नही है , तुम रोना मत उन्हें यूँ देख न खुद को किसी उदासी में डुबोना न उन्मलान होना , क्या तुम जानते हो ये टूटते पत्ते कपोल से पल्लव कोमल थे सुरमई लाल फिर होते - होते धानी पहने चोला हरित बारिश में झूम - झूमकर भीगे है 

विश्व में अटल सत्य के चिरवास का .!

ओ !  इतिहास   की  घड़ियाँ  चुप   खड़ा   निस्तब्ध  क्या  तूने  पहने  ली  बेड़ियाँ  अचंभा  में  पड़ा शून्य  को  तकता निर्जन  में  अकेला  जर्जर  वृध्द  ? परिवर्तन  की  आंधियाँ बदल  देती  है  कितना  कुछ

जब सफर में ...

शुरु  - शुरु  में  थोड़ा  मुश्किल  था  पर  मन  था  शुरुआत  हो  ही  गई । हालिक  अभी भी  झिझक  गई  नही  है  ,  यह  मन का  अजीब  द्वंद्व  है  जहाँ  इसे  नयी  दिशाओं  की  तलाश  भी  है  और   एक  तरफ   नहीं   की  जकड़न  से   बंधा  बार  -  बार   पीछे  को  खींचा  चला  जाता  है  ,  पर  अब   जब   सफर  में   निकलने  के  लिए  पहला  कदम  रख  ही  दिया  है   तो  ठीक  है  ...  कुछ  सीखने  को  ही  मिलेगा   । मेरा  यूट्यूब  चैनल  -   Nature feel of soul  

तमाशा

अम्बर सा रंग , धरती मेरी धानी  सागर का बहता पानी ,  देती मोती सपनों को आकार कोरे मन की ये कोरी सी कहानी कहता क्या रंग , कहता है क्या पानी उड़ने की जो दिल - ए - तमन्ना    ये मन ने है ठानी 

जनपथ बहुराती

संकेत संकेतक कभी शुभ समाचार की कभी किसी अनहोनी अनिष्ट की दोनों ही रहस्य भविष्य के गर्भ में छिपे है जिसको उस त्रिकालदर्शी के सिवा मैंने क्या किसी ने भी नहीं देखा , तो सुख- दुख के तराजू बराबर है दिन के बाद रात, रात के बाद दिन कोई बाधा नहीं , फिर अस्वीकार कैसा