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जन्मदिन मुबारक हो प्रियंका

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सोचती हूँ  कि फिर एक बार  छोटी हो जाओ  नहीं  बनना बड़ा  , हमारा बचपन  ही  था भला पर  जिस  गाड़ी  पर  हम  बैठे  है  रुकती  ही  नहीं मुझे  मुड़कर  देख  मुस्काना  होता  है  यादों  की  चाँदनी  रात  में टिमटिमाते  सितारों  को देखना होता है कैसे होती थी सुबह  स्कूल  जाने  को  सुहानी  सुबह

संदर्भ की जरुरत न पड़ती

शून्य  की  संवेदनाएँ  सच्ची  होती  है साथ  चलती  हुई   दुआओं   में दीये  की   पीली   रोशनी  सी अपने  विश्वास  का  उत्सव  मनाती    कभी  बिफरने  नहीं  देती   परस्पर   एक  -  दूजे   का  यह  प्रेम समय  सरगम  की  गहरी  थाह  है संदर्भ  की  जरुरत  नहीं  पड़ती  किसी  भी  छोर  से  वो  बात   शुरु  कर  दे  , सुनने  में  उसे  देर  न  लगती बंसी   सजाकर   मधुर   राग  से  पूरक  बनती

अपनी हँसी

एक प्याली  चाय और  तुम्हारी  हँसी अपनी  हँसी  ... सोती  जागती  भागती  जिंदगी के  बीच   एक  स्त्री  की   हँसी  वह  रिक्त  कोना  जहाँ   अक्सर  अपने जिम्मेदारियों  का  बीहड़  उगाते  रहते  है और  तुम उसे  बड़ी  सफाई कलात्मक  रुचि के साथ  काँटती - छाँटती  बगिया   बनाने में  पूरा दम  भर देती  हूँ  ।