संदेश

अप्रैल, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

किराने की दुकान तक

जब तब और अब के बीच का सफर किराने  की  दुकान  तक  जाना मेरे  और  तुम्हारे  संदर्भों  में  अलग-अलग  होते  है बचपन  मैं   लालायित  रहता है बालमन  ,  मनाहीं  में   किशोरमन तरुणाई  में  अदद  रौब  हम  अब  बच्चे नहीं अकेले  जा सकते है , दोस्त के साथ  जायेंगे स्कूटर  बाइक  भी  तो  है   तभी  दो  दिन  का  अंतराल अरे  माँ , भैया को  कहे  दो  या श्यामा  को   कह  दो  , हमारे  पास  समय  नहीं  है 

अनबुझ फिर भी

स्पष्ट है चुप है ताना - बाना उछलती गेंद  घूरती आँख टेसू के लाल फूल  धूप में जलता ग्लोब  निर्मोह बनी अँखिया अपनी - अपनी कहानियों में डूबी हुई  उलझे हुए धागे उनकी उलझी हुई गाँठें दोनों छोर व्यथित टूटे जिंदगी की सीढ़ी ऊपर - नीचे , नीचे - ऊपर