अनबुझ फिर भी
स्पष्ट है चुप है
ताना - बाना
उछलती गेंद
घूरती आँख
टेसू के लाल फूल
धूप में जलता ग्लोब
निर्मोह बनी अँखिया
अपनी - अपनी कहानियों में डूबी हुई
उलझे हुए धागे उनकी उलझी हुई गाँठें
दोनों छोर व्यथित टूटे
जिंदगी की सीढ़ी ऊपर - नीचे , नीचे - ऊपर
तूफ़ान को घोलती ज्वार
गिर जाती लहरें
विक्षिप्त सम अकुलाती
किस तह में हाँ तुम्हारी
मेरे बंद हूँ कि कसमसाहट
का तुला डोलता
नीरव जो बस चुप शून्य अटक
सूक्ष्म जीवी रिक्त गह्वर में आकाश भी भ्रम में तिरता और
अपनी प्रतिक्षा में नित बनता मिटता वही माटी का एक खिलौना
सब कुछ एक माटी का खिलौना ही तो है प्रिया जी। गहराई है आपकी अभिव्यक्ति में।
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