सौजन्य : दूरदर्शन झारखंड
मन मंदिर प्रभु का सुंदर धाम
भक्ति की पावन ज्योत अभिराम
तम की कारा से करती जो मुक्त
तुम संघर्ष की अमिट गाथा
वीरता प्रेम की अमित भाषा
दया स्नेह से पुलक वत्सल
सुप्त न अब खोए , यूँ सोये रहो
प्रात उदित नवजीवन की बेला यूँ खिलती
रेशों रेशों , धानों धानों छिटक तिनके
अंक भर अपने प्रात लेती , हिये की संवेदी
निकृष्ट विचार न मैल रहे , आत्मशोधन की
दीप वर्तिका मन मंदिर चलो मिलकर प्रज्ज्वलित करे ।
बहुत सुंदर गीत है यह। साझा करने हेतु बहुत-बहुत आभार प्रिया जी।
जवाब देंहटाएंआपका भी आभार और स्वागत आदरणीय 🙏
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंhttps://vivj2000.blogspot.com/
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर रविवार 17 मई 2026 को लिंक की गयी है....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
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बहुत सुन्दर .
जवाब देंहटाएंधन्यवाद !
हटाएंबेहतरीन
जवाब देंहटाएंधन्यवाद !
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