यह मंदिर का दीप इसे नीरव जलने दो रजत खंड - घड़ियाल स्वर्ण वंशी - वीणा - स्वर , गये आरती बेला को शत - शत लय से भर , जब था कल - कंठों का मेला , विहँसे उपल तिमिर था खेला , अब मंदिर में इष्ट अकेला , इसे अजिर का शून्य गलाने को गलने दो ।
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