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संदेश

दिवाली की रौनक तभी सफल बने

सर्द दिनों की रुहानी आहट लिए मौसम का रुख बदला है सिमटा - सिमटा दिन  गुलाबी ठंडक लिए  सूरज आसमाँ के पट पर खिलने लगे गुलाब  मंजरी पर पुलकित पुष्प

रामवृक्ष बेनीपुरी गेहूँ बनाम गुलाब निबंध

रामवृक्ष बेनीपुरी गेहूँ बनाम गुलाब निबंध गेहूँ हम खाते हैं, गुलाब सूँघते हैं। एक से शरीर की पुष्टि होती है, दूसरे से मानस तृप्‍त होता है। गेहूँ बड़ा या गुलाब? हम क्‍या चाहते हैं - पुष्‍ट शरीर या तृप्‍त मानस? या पुष्‍ट शरीर पर तृप्‍त मानस? जब मानव पृथ्‍वी पर आया, भूख लेकर। क्षुधा, क्षुधा, पिपासा, पिपासा। क्‍या खाए, क्‍या पिए? माँ के स्‍तनों को निचोड़ा, वृक्षों को झकझोरा, कीट-पतंग, पशु-पक्षी - कुछ न छुट पाए उससे !

तमाशा

अम्बर सा रंग , धरती मेरी धानी  सागर का बहता पानी ,  देती मोती सपनों को आकार कोरे मन की ये कोरी सी कहानी कहता क्या रंग , कहता है क्या पानी उड़ने की जो दिल - ए - तमन्ना    ये मन ने है ठानी 

जनपथ बहुराती

संकेत संकेतक कभी शुभ समाचार की कभी किसी अनहोनी अनिष्ट की दोनों ही रहस्य भविष्य के गर्भ में छिपे है जिसको उस त्रिकालदर्शी के सिवा मैंने क्या किसी ने भी नहीं देखा , तो सुख- दुख के तराजू बराबर है दिन के बाद रात, रात के बाद दिन कोई बाधा नहीं , फिर अस्वीकार कैसा

हम सब एक परिवार है

जरुरी नहीं की हर गीत लिखा जाए  कुछ गीत बस यूँही गुनगुना लिया जाए खुली हवा में खुले जीवन के साथ  हर बाधा से मुक्त अविमुक्त  स्वतंत्र खग की उड़ान  अनन्त व्योम में विचरते बादलों की भाँति बिना व्यक्त किए व्यक्त कर देने की बात  हवाओं की शीतल छाँह में घुलते शब्द

चलते चलो

देख आसमान को और उठ खड़ा हो  चलते चलो उसके साथ  मुश्किलों में भी जीना सीखो बनते - मिटते नित ये बादल जीवन की सच्चाई है आज है तो कल नहीं वही याद रहे जो सूखे दिन में आ करुण बरस गए  सूखी तलहटी में जीवन को भर गए  फूल खिले फसलें लहरायी

सेवाभाव पथ लक्ष्य यहीं

वक्त के साथ बदलता अदब हर साँचे में ढलना  कदम से कदम मिलाकर चलना भीड़ की मक्खी बन जाना आसान है , पर खुद को खुद में रहकर तराशना थोड़ा   मुश्किल है , अपनी गलतियों को समझना और सुधारना  सुधार की अपेक्षा तो हम सदैव दूसरों से ही रखते है