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संदेश

मेरे झूठे तर्क तुम्हारे उजले सत्य की सारे

सारा   बोझा   बंद   आँखों   में   उतारकर झील   के    उस   किनारे   का   इंतजार तरंग    उछलते   कंकड   ढूँढे    न    अब कोई   प्रश्न   नाही   उत्तर   की    दरकार  मेरा   होना   भी  एक   भूल   लागे   जब नयन    समक्ष   दर्पण   मन   का   निहारे झूठे   पैबंद   से   फट्टे    आवरण   तिनके कितनी    बार    दोहराव    दुशाला  ताने

वासंती हवा

  इन वासंती हवाओं के टूटे पत्ते बुलाते रास्ते पर आज भी मिल जायेंगे  उसी ताजगी के एहसास को लिए भोर में  अपनी महक को घोलते हुए कलियों के पहरुए वे कपोलें नव पिछली बार देखे थे  अभी वे कितने ही प्रतीक्षित  न जाने कौन इतना लंबा बीता समय चुप अपने में मुझे - तुम्हे   आते - जाते बनते - मिटते अफसाने शोर और खामोशियों के बीच का पूल किनारे पर उग आई धूप और 

हम कठपुतली

हमें  अपने  बचपन  की  याद  तभी आती  है । जबकि   बचपन   बीत  गया  होता  है ।। कितना   कुछ    बदल   जाता  है । और   जो   बदल   ना   सके    वो   जिंदगी   जिंदगी    नहीं ।।

धूप की महक

धूप की महक   हवा में आती खिड़कियों के   बंद किवाड खोल अस्त - व्यस्त से घर को जगाती तपिश आँसू की बदली छटती हुई  बंसत की बहार   जल्द अपने पीले

उस खत को मेरा शुक्रिया ..!

खत लिखना है मुझे अपनी नादानियों नासमझी बेवकूफियों का जिन पर जमाना हमेशा से हँसता आया उन  शर्तिया  पसंद - नापसंद उलाहनों  का 

सुबह भोर उठती है

सुबह  भोर  उठती  है सर्दी - गरमी  चाहे  जैसे  दिन  हो खाने  बनाने बर्तन  माँज कपड़े धोती झाडू   ले  बहुराती  आंगन पोछा  मार  फर्श  चमकाती कोनों - कोनों का  रखती ध्यान समय  की  चौकसी  में पूरा  करती  सारे  प्रबंध  रखती  सबकी  पसंद - नापसंद  का  ध्यान  भक्ति  की  भावना  में  डूबी  करती  ईश आराधन

बच्चों के लिए

👉  बाँकी बाँकी धूप