सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पारिजात

अकेले ये दोनों पीढ़ियाँ

दो   पीढ़ियों   का  अन्तराल   है   ये

विडम्बना   की    आवाज   देता   

एक  तरह  से  अन्तर्मन  को  चीरता

असह्य  पीड़ादायक   दर्द   है ,

ये   दो   पीढ़ियाँ   विवश   है  

रह   रहकर   यह   दंश   सीने  पे  झेलती  है

इन्होंने   शायद  खुद  सीमा  तय   कर   ली  है

ये   दोनों    पीढ़ियाँ   एक   दूसरे   से   

दो    हाथ   फासले   पर    खड़ी   है

निकट   आकर   एक   -   दूसरे   से

बात   तो   करना   चाहती    है   पर

ये  कहीं  उनके  दिवास्वप्नों   में   घटित  होता  है

उनकी   आकांक्षों   अपेक्षाओं   में  

एक    दूसरे   को   ना   समझ   पाने   का

आरोप  -   प्रत्यारोप   और   अंत   एक

तीखा    स्वर    झल्लाता    सा    द्वंद्व   के

कितने   रुप   है   इस    जहाँ   में 

बाहर    तो    है   ही  ,  पर   भीतर   भी

एक   द्वंद्व    छिपा    है   निर्मम 

जिसके    कुठाराघात    हृदयतल   पर 

हथौड़े    से    चोट   करते   है

ये   दोनों   पीढ़ियाँ    हाथ   में

एक   रस्सी   लिए   है ,  ये  

चाहती   तो    है   कि   इस   रस्सी

को   पकड़कर   वे   एक  बार   जुड़   जाए 

जितने   पूर्वाग्रह   जितने    गिले   शिकवे

शिकायतें    है   ,   सब   दूर   हो   जाए 

एक   बार   खुद   को    एक -  दूसरे   के

स्थान   पर   रखकर    देख   ले 

कितनी   ठेस   पहुँची   है  ,   जब   से

ये   बेरुखी    को   अपनाया   है

खुलकर   दो   पल   बात   भी   नहीं   हो  पायी

और   जब   कभी   बात   का   मौका   मिला

तो   धीरे   से   फिर   वही   तकरार  छिड़  गई 

जैसा   की   अभी   दोनों   हाथ   में

रस्सी   लिए   जोर   रस्साकस्सी   कर   रहे  है 

दोनों   मजबूर  , उन्हें   ही   जीतना   है 

पर   दोनों   ही   असल   में   हार   रहे   है

और    कहीं    छुपके    सोच   भी   रहे  है

पर    अकेले   ये   दोनों   पीढ़ियाँ  ।



टिप्पणियाँ

  1. कटु सत्य।
    सुंदर प्रस्तुति।

    जवाब देंहटाएं
  2. आपने दो पीढ़ियों के बीच की खामोश जंग को बहुत सटीक तरीके से उकेरा है। “रस्सी की रस्साकस्सी” वाला प्रतीक तो कमाल का है, बिल्कुल हमारी रोज़मर्रा की हकीकत जैसा। दोनों तरफ़ समझने की चाह है, लेकिन अहंकार और पूर्वाग्रह बीच में दीवार बन जाते हैं। सबसे अच्छा लगा कि आपने किसी को दोष नहीं दिया, बस रिश्तों की कड़वाहट को ईमानदारी से दिखाया।

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

आप सभी सुधी पाठक जनों के सुझावों / प्रतिक्रियों का हार्दिक स्वागत व अभिनंदन है ।

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

दिवाली की रौनक तभी सफल बने

सर्द दिनों की रुहानी आहट लिए मौसम का रुख बदला है सिमटा - सिमटा दिन  गुलाबी ठंडक लिए  सूरज आसमाँ के पट पर खिलने लगे गुलाब  मंजरी पर पुलकित पुष्प

रामवृक्ष बेनीपुरी गेहूँ बनाम गुलाब निबंध

रामवृक्ष बेनीपुरी गेहूँ बनाम गुलाब निबंध गेहूँ हम खाते हैं, गुलाब सूँघते हैं। एक से शरीर की पुष्टि होती है, दूसरे से मानस तृप्‍त होता है। गेहूँ बड़ा या गुलाब? हम क्‍या चाहते हैं - पुष्‍ट शरीर या तृप्‍त मानस? या पुष्‍ट शरीर पर तृप्‍त मानस? जब मानव पृथ्‍वी पर आया, भूख लेकर। क्षुधा, क्षुधा, पिपासा, पिपासा। क्‍या खाए, क्‍या पिए? माँ के स्‍तनों को निचोड़ा, वृक्षों को झकझोरा, कीट-पतंग, पशु-पक्षी - कुछ न छुट पाए उससे !

जन्मदिन मुबारक हो प्रियंका

सोचती हूँ  कि फिर एक बार  छोटी हो जाओ  नहीं  बनना बड़ा  , हमारा बचपन  ही  था भला पर  जिस  गाड़ी  पर  हम  बैठे  है  रुकती  ही  नहीं मुझे  मुड़कर  देख  मुस्काना  होता  है  यादों  की  चाँदनी  रात  में टिमटिमाते  सितारों  को देखना होता है कैसे होती थी सुबह  स्कूल  जाने  को  सुहानी  सुबह

मोबाइल पर बहुत कुछ अच्छा भी होता है

 सौजन्य  : दूरदर्शन झारखंड मन  मंदिर  प्रभु  का  सुंदर  धाम भक्ति  की  पावन  ज्योत  अभिराम तम  की कारा से  करती  जो  मुक्त  तुम  संघर्ष   की  अमिट  गाथा वीरता  प्रेम  की  अमित भाषा दया  स्नेह   से  पुलक  वत्सल सुप्त  न  अब  खोए  , यूँ  सोये  रहो प्रात उदित  नवजीवन की  बेला यूँ खिलती रेशों  रेशों  , धानों  धानों  छिटक  तिनके अंक भर अपने प्रात लेती ,  हिये की संवेदी निकृष्ट विचार न  मैल  रहे  ,  आत्मशोधन की  दीप वर्तिका मन मंदिर चलो मिलकर प्रज्ज्वलित करे ।

सफरनामा

उठो देखो आसमान की नीलिमा  वे  घुँघराले फाहे बादल जिस तरह से आसमाँ में  अपनी गति से  चले जा रहे है  तुमको भी चलना है , विश्राम  का मतलब ठहरना  नहीं  है अपनी  ऊर्जा   को  संयत  करना  है

माँ

माँ का नाम ही काफी है हर पीड़ा और मुश्किल से बाहर निकलने के लिए मेरी चोट का मरहम माँ ही तो है  सबसे प्यारी हमेशा मेरी ही चिंता में घुलने वाली माँ  देखती हूँ जो तेरा प्यार  मैं  भी  बड़ी बच्ची  तेरी स्नेह  छाँव  में  ही  हर पल  जीवन का गुजारु अभिलाषा मन की , वरदान ईश से और क्या ही मांगू  बस  तुमको  ही  चाहूँ  , तुम्हारा ममताभरा स्पर्श  मीठे स्वर तुम्हारा साथ , तुम्हारा लहराता स्निगध आँचल और ढ़ेर सारा प्यार ।

इबादत जो देखी है

अपलक नयन तीरे एक अकूल तट विमल    सपतरंग सप्तपर्ण प्रतिबिंब खिलते शतदल कमल फैला हुआ विस्तृत क्षितिज  ठन गई है बात खुदा से

अजन्ता - भगवतशरण उपाध्याय रचित निबन्ध

जिन्दगी  को  मौत  के  पंजों  से  मुक्त  कर  उसे  अमर  बनाने  के  लिए  आदमी  ने  पहाड़  काटा  है । किस  तरह  इंसान  की खूबियों  की  कहानी  सदियों  बाद  आने  वाली  पीढ़ी  तक  पहुँचायी  जाये , इसके  लिए  आदमी  ने  कितने  ही  उपाय  सोचे  और  किये । उसने  चट्टानों  पर  अपने  संदेश  खोदे , ताड़ों  से  ऊँचे  धातुओं  से  चिकने पत्थर  के  खम्भे  खड़े  किये , ताँबे  और  पीतल  के  पत्थरों  पर  अक्षरों  के  मोती  बिखेरे  और  उसके  जीवन - मरण  की  कहानी  सदियों  के  उतारों  पर  सरकती  चली आयी , चली  आ  रही  है , जो  आज  हमारी  अमानत - विरासत  बन  गयी  है ।       इन्हीं  उपायों...

पहाड़ी ढलान पर से

पहाड़ी  ढलान   पर   से सरकता   सांझ   का   वक्त गुलाबी  लाल  से  सुरमाई बादल सूरज  का   गोलाकार   रुप प्रत्यक्ष  सीधे   अब  जाते - जाते ज्यों  आँखें  मीचे  गीत  कोई  पहाड़ी  गाता  धुन  वो  जीवन की   सुनाता    बंद  तरानों को  बरसो  छेड़े  कोई  अपना याद  आता   अग्नि  की  ऊष्म पोरे  -  मिलकर  बोले   साँवरे यहीं  कही  बंसी  बजाता । 👉  कनेर

हँसो हँसो खूब हँसो लाॅफिंग बुध्दा

हँसो   हँसो   खूब   हँसो   लाॅफिंग   बुध्दा हँसो   हँसो   खूब   हँसो   लाॅफिंग   बुध्दा हँसो   हँसो    जमकर   हँसो   लाॅफिंग   बुध्दा हँसो   हँसो   मिलकर   हँसो   लाॅफिंग   बुध्दा हँसो   हँसो    खुलकर   हँसो   लाॅफिंग   बुध्दा हँसो    हँसो    तबीयत   से   हँसो   लाॅफिंग  बुध्दा मुश्किलों    की    कठिन    डगर   पर   हँसो कंक्रीट    की   गढ्ढे   वाली   सड़क   पर  हँसो