हम कठपुतली


हमें  अपने  बचपन  की  याद  तभी आती  है ।

जबकि   बचपन   बीत  गया  होता  है ।।

कितना   कुछ    बदल   जाता  है ।

और   जो   बदल   ना   सके    वो   जिंदगी  

जिंदगी    नहीं ।।

हम   कठपुतली  का   खेल  देखकर  

खिलखिलाते   है   मुस्कुराते  है   जमके

ताली   भी    बजाते   है  

पर   जब   हम   उस   रब   की   कठपुतली

इस   खेल   का   हिस्सा   बन   जिंदगी   के

मंच   पर  उतरते    है   तो  खिसियाते   है ।

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