वासंती हवा


 

इन वासंती हवाओं के टूटे पत्ते

बुलाते रास्ते पर आज भी मिल जायेंगे 

उसी ताजगी के एहसास को लिए भोर में 

अपनी महक को घोलते हुए कलियों के पहरुए

वे कपोलें नव पिछली बार देखे थे 

अभी वे कितने ही प्रतीक्षित 

न जाने कौन इतना लंबा बीता

समय चुप अपने में मुझे - तुम्हे  

आते - जाते बनते - मिटते अफसाने

शोर और खामोशियों के बीच का पूल

किनारे पर उग आई धूप और 

फुनगी से सुंदर पुष्प गुच्छ 

ढूँढ ही लेती है अपनी जिदंगी

की खिलखिलाती मुस्कान 

मुरझाने से बेखबर छिपे पंख

वितानों की गहराई सागर का नील

बन जब मेघ बरसता वे मीठे जल

कागज की कश्तियों का जमाना

पुआल की झोपड़ी और मिट्टी की

चाक पर बने वे खिलौने चूल्हा - चौका

छोटा सा घरौंदा पूर्ण प्रारुप स्वप्न नयन

हाथ पर घूमती गुदगुद कीली गोल  

खुरचियों की ताना - बानी 

कनेर के पीतवर्ण फूल के इंतजार 

में बंद कोटर सी हरियाली का जागना

कच्ची गलियों से होकर आई

द्वार पर हर बरस चुपचाप पात बन  

अपनी कहानी हौंले रव में सुना देती मुझको 

ऊँची इमारतों के बीच ढूँढ लेती अपना पता वासंती हवा

कि भूला नहीं अब भी ..!


टिप्पणियाँ

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द शनिवार 24 जनवरी , 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  2. रचना को पाँच लिंकों के आनंद में शामिल करने के लिए हृदय से धन्यवाद ।

    जवाब देंहटाएं

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