जहाँ से समय होकर निकलता है
वहाँ देहरी के द्वार दो टेक अँखिया
द्वंद्व निर्वतमान अपने सपने बुनती
आसमान के प्रांगण में नीलिमा की
जादुई , चहक भरे बक्से का पिटारा
आज अभी अब से शेष प्रश्नों के
इतर पीढ़ियों को मजबूत करती है
धूप - छाँव राहों की तटरेखा पर
सूर्य सागर चंद्र नखत जो थोड़े ओझल
प्रभात की अभिप्सा खोई फिर प्रभात
में मिलती है , शुभप्रभात ! जिंदगी फिर
तुझसे कहती है । 😊🙏
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