पहाड़ी ढलान पर से
सरकता सांझ का वक्त
गुलाबी लाल से सुरमाई बादल
सूरज का गोलाकार रुप
प्रत्यक्ष सीधे अब जाते - जाते
ज्यों आँखें मीचे गीत कोई
पहाड़ी गाता धुन वो जीवन
की सुनाता बंद तरानों
को बरसो छेड़े कोई अपना
याद आता अग्नि की ऊष्म
पोरे - मिलकर बोले साँवरे
यहीं कही बंसी बजाता ।
👉 कनेर
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द रविवार 07 दिसंबर , 2025 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंमनमोहक सृजन ।
जवाब देंहटाएंकेनवस पर एक चित्र सा खींच दिया अपने ... सुन्दर सृजन ...
जवाब देंहटाएंधन्यवाद !
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंपहाड़ी गाता धुन वो जीवन की , खूबसूरत
जवाब देंहटाएंआप सभी का स्वागत और धन्यवाद !
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