फेरीवाला और नन्हीं गुडियाँ
फेरी वाला बेचता सामान
नन्हीं - नन्हीं गुड़ियाँ
उसकी बाबुल की मेहमान
साँवरी गोरी पहने लाल
गुलाबी केसरिया पीला नीला
हरा धानी घाघरा - चोली
सिर पे ओढ़े वो सतरंगी चुनरदेती इंद्रधनुष को जो टक्कर
लगाती अगल - बगल उसके
सामान के चक्कर
करती मुयाना पसंद बताती
अपनी झटपट दे दो भैया मुझको ये
रिबन फ्राॅक वाली प्यारी गुड़ियाँ
👉 कनेर
वाह
जवाब देंहटाएंसरल,सहज,सुंदर बाल रचना।
जवाब देंहटाएंसादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शनिवार २० दिसम्बर २०२५ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
सुंदर
जवाब देंहटाएंधन्यवाद !
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंयार, यह कविता पढ़कर बिल्कुल वही दृश्य मन में आ गया, जैसे कोई फेरी वाला आकर रंग-बिरंगी गुड़ियाँ बेच रहा हो। हर छोटी-छोटी डिटेल, जैसे लाल, गुलाबी, पीला, नीला घाघरा और सतरंगी चुनर, सब सच में आंखों के सामने तैरने लगे। वो नन्हीं बच्ची जो झटपट कहती है “भैया, मुझे ये दे दो”, उससे एक मासूमियत और खेल-खिलौनों की खुशबू महसूस होती है।
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