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लोक संस्कृति और लोकरंग

 लोक संस्कृति की जीवंतता का कारण उसकी सरलता, मधुरता, समाज का आपसी सहकार का सुन्दर समन्वय और संस्कृति की जीवंतता का रंग है। यदि आज इस आधुनिक परिवेश में भी लोक संस्कृति ने अपनी सत्ता को बनाये रखा है, तो इसका कारण यह है कि उसके साथ लोक जीवन जुड़ा हुआ है। आज के इस परिवेश में लोक जीवन तेजी से बदल रहा है, पर एक स्थिरता को बनाए रखने की प्रवृत्ति, अपनी कला के प्रति गहन रुचि, अपनी विरासत को विकास की ओर ले जाने की इच्छा ने इस लोक संस्कृति से जुड़े हुए इन सुन्दर रंगों को बचाकर रखा है ।


समाज के कुछ जागरूक लोग और ग्रामीण अंचल के सामान्य रूप से जीवनयापन कर रहे हैं, सामान्य लोगों के अनुकरणीय व प्रेरक उद्देश्यों से ही यह प्रवृत्ति कार्य कर रही है, अन्यथा आधुनिक पाश्चात्य सभ्यता के रंग के प्रभाव में आकर हम लोग अपनी ही संस्कृति के सुन्दर रंगों से मुँह  मोड़कर  ,  
संकीर्ण- बिगड़ी हुई मानसिकता का शिकार होकर एक गहन पतन के अंधकार में ही गिर रहे थे । आज समाज में यदि लोक संस्कृति का लोक रंग जीवन में घुला हुआ है और भारत के बाहर अन्य देशों के लोग भी इससे जुड़ रहे हैं और इसके लिए उन्हें राष्ट्रीय - अंतर्राष्ट्रीय मंच प्राप्त हो रहा है, तो यह इस प्रकार की कोशिशों के कारण ही संभव हो सका है  जो अपनी संस्कृति, अपनी कला, अपनी विरासत को एक वृहत जीवन दृष्टिकोण के रूप में देखती है। हमारी संस्कृति के ये सुन्दर लोक रंग हमारी संस्कृति के जीवन आधार है, यदि यहीं लोक रंग विलुप्त होने के कगार पर आकर खड़े हो जाए तो क्या ? हमारा यह समाज जो आधुनिक तकनीकी दुनिया की दौड़ में तेजी से दौड़ रहा है, उसकी गति धीमी नहीं होगी, क्या संस्कृति के बिना भी जीवन का आधार रहता है? विकास का अर्थ है - चहुँमुखी आयाम  में हुई प्रगति यदि कुछ आयामों को महत्वपूर्ण मानकर किसी एक आयाम की अवहेलना की जाए तो वह विकास नहीं है । इसलिए लोक संस्कृति को बढ़ावा देना, उनके विकास का अर्थ होगा सांस्कृतिक विकास जो कि हमारे आधुनिक सांस्कृतिक विकास को संतुलित करके मानवता के विकास की प्रेरक शक्ति का स्रोत बनेगा। लोकरंग से सजी लोक संस्कृति जीवन को अध्यात्म से जोड़ने का सबसे सरल सहज उपाय है । विभिन्न परिस्थितियों में जीवन को उत्साह - उल्लास के साथ जीने की एक अंतर्शक्ति देने का कार्य करती है - हमारी यह लोक संस्कृति । इन मौलिक लोक संस्कृति से जुड़ी लोक परम्परा में बड़े ही सरल - सहज भाव - विभोर करने वाला  सौंदर्य विघमान है । इसकी साधारणता ही इसे असाधारण बनाती है । अपनी इसी जीवंत शक्ति के बल पर ही आदिम सभ्यता के विकास के साथ-साथ इन लोक संस्कृति के  लोक रंग अपने सुंदरतम इतिहास को सहेजते हुए, विभिन्न कालखंडों में अपनी छाप छोड़ते हुए, नए समय के साथ-साथ नए रंगों को अपनाते हुए, अनवरत रूप से चहुँओर बढ़ते हुए लोक मानस को आनंदित किये जा रहे हैं।

यह  भी  पढ़े -  भारतीय लोक संस्कृति

टिप्पणियाँ

  1. आप लोक संस्कृति को किताबों की चीज़ नहीं, बल्कि जीते-जागते जीवन की तरह सामने रखते हैं। आप साफ़ दिखाते हैं कि लोक रंग केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की रीढ़ हैं। मुझे यह बात खास लगी कि आप विकास को सिर्फ़ तकनीक तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसे संतुलन से जोड़ते हैं।

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