हर दिन की तरह आज का भी दिन अपने में नया है अनेक संभावनाओं अवसरों को लिए आज का दिन भी दरवाजे पर दस्तक दिए खड़ा है , कल पर छोड़कर क्या फायदा कल किसने देखा है ? तो फिर जरुरत है तो बस अपने आज को संवारने की , बीते कल से उतना ही लो जितना की ठीक हो जिंदगी की गाड़ी अपनी सही रफ्तार के साथ चलती रहे वर्ना ज्यादा बोझा लेकर चलने से सफर का कोई मतलब ही नहीं रहे जाता है
और इसी प्रकार उस कल की जो अभी तक आया ही नहीं जिसके वास्तविक यथार्थ से आप अपरिचित है उसकी चिंता में घुन की तरह धुनना और अपने निकट वर्तमान की बलि चढ़ा देना अपने भविष्य के साथ एक तरह से खिलवाड़ ही है । जो बीत गया और जिसका अभी कुछ पता ही नहीं इन दोनों के बीच की अनसुलझी कशमकश जिदंगी को दो राहों पर लाकर खड़ा कर देती है , इन दोनों ही राहों में आपका रास्ता कोई नहीं है , ये तो मात्र दुविधा है । आपका वर्तमान आपका आज सदैव आपको अपने आज में स्थित होकर नित नूतनता नवाचार नव उम्मीद नव सृजन नव निर्माण की राह देता है अब आपको ही तय करना होगा कि आप किस राह को चुनते है ।
रामवृक्ष बेनीपुरी गेहूँ बनाम गुलाब निबंध गेहूँ हम खाते हैं, गुलाब सूँघते हैं। एक से शरीर की पुष्टि होती है, दूसरे से मानस तृप्त होता है। गेहूँ बड़ा या गुलाब? हम क्या चाहते हैं - पुष्ट शरीर या तृप्त मानस? या पुष्ट शरीर पर तृप्त मानस? जब मानव पृथ्वी पर आया, भूख लेकर। क्षुधा, क्षुधा, पिपासा, पिपासा। क्या खाए, क्या पिए? माँ के स्तनों को निचोड़ा, वृक्षों को झकझोरा, कीट-पतंग, पशु-पक्षी - कुछ न छुट पाए उससे !
ज़िंदगी के दोराहे अक्सर भ्रमित करते हैं और.तय करना भी कभी -कभी बहुत कठिन होता है कौन सा हमारे लिए सही है स्वविवेक और अंतर्मन के निर्देश पर लिया गया निर्णय सदैव जीवन को नयी नयी दिशा प्रदान करता है।
जवाब देंहटाएंसादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शनिवार १९ जुलाई २०२५ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
सच है ।
जवाब देंहटाएंमन के सच्चे भाव 🙏
जवाब देंहटाएंसार्थक लेख
जवाब देंहटाएंहम अक्सर कल के पछतावे या आने वाले कल की चिंता में अपना आज बिगाड़ लेते हैं। आपने सही कहा कि जो बीत गया वो लौटेगा नहीं और जो आने वाला है उसका अभी कोई ठिकाना नहीं। मुझे सबसे ज्यादा अच्छा लगा कि आपने आज की अहमियत पर जोर दिया।
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