पृथिवीसूक्त
सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति ।
सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः ।।
संदर्भ - अथर्ववेद 12 वाँ काण्ड प्रथम सूक्त
दृष्टा ऋषि अथर्वा देवी भूमि ।
प्रस्तुत मंत्र में पृथिवी माँ के कल्याणमयी स्वरुप का गौरवपूर्ण गान किया गया है । सत्य महिमा , ऋत् ( शाश्वत , नियम ) उग्रता ( शक्ति ) , दीक्षा ( ज्ञान ) , तपस्या ब्रह्म ( वेद ) और यज्ञ ( शुभ कर्म ) पृथिवी को धारण करते है । भूतकाल और भविष्यकाल की रक्षिका पृथिवी हमारे लोक को विस्तृत बना दे व भीतर की संकीर्ण भावना का नाश कर लोक कल्याणकारी समदृष्टि का विकास करे तथा हमारे बीच आपसी बंधुता और सौहार्द का वातावरण निर्मित हो । हे पृथिवी माँ ! आपका सुंदर रुप यूँही हम सबको आह्लादित करता रहे ।
असंबाधं मध्यतो मानवानाम् यस्या उद्वतः प्रवतः समं बहु ।
नानावीर्या ओषधीर्या विभर्ति पृथ्वी नः प्रथतां राध्यतां नः ।।
संदर्भ - अथर्ववेद द्वादश 12 वाँ काण्ड
मंत्र दृष्टा - अथर्वा , देवी भूमि
अर्थात जिस पृथ्वी पर बहुत से ऊँचे - नीचे और समतल क्षेत्र मनुष्य के बीच बाधारहित स्थित है । जो अनेक प्रकार की शक्तियों से युक्त औषधियों को धारण करती है वह पृथ्वी हमारे लिए विस्तृत हो व भोगवाद और संकीर्णता की तुच्छ वृत्तियों को समाप्त कर अपने इस विशाल प्रांगण में मिल - जुलकर रहने की भावना का विकास करे । हे पृथिवी माँ तुमको बारंबार प्रणाम है ।
वाह सुन्दर प्रार्थना
जवाब देंहटाएंइसे पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे वेद सिर्फ ग्रंथ नहीं, बल्कि आज की ज़िंदगी से सीधी बात कर रहे हों। पृथ्वी माँ को आपने जिस तरह सत्य, तप, ज्ञान और शुभ कर्म से जोड़ा है, वह मन को बहुत शांत करता है। ये मंत्र याद दिलाते हैं कि धरती केवल संसाधन नहीं, हमारी संवेदना और सहअस्तित्व की आधारशिला है।
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