मेरे झूठे तर्क तुम्हारे उजले सत्य की सारे
सारा बोझा बंद आँखों में उतारकर
झील के उस किनारे का इंतजार
तरंग उछलते कंकड ढूँढे न अब
कोई प्रश्न नाही उत्तर की दरकार
मेरा होना भी एक भूल लागे जब
नयन समक्ष दर्पण मन का निहारे
झूठे पैबंद से फट्टे आवरण तिनके
कितनी बार दोहराव दुशाला ताने
अंतर्मन की वीथिका उलझी गाँठ
स्पंदन के तार अपनी धुन रीते
श्रवणी संझा पुनः पुकारे छिप
दृश्य मूक तुम्हारे बंधन का दोष
कहे पाँव हमारे आवृत्त चिन्ह क्या
नहीं मेरे मन की अपने व्यथा के
वारे ! आह ! की टीस गह्वर होती
लौट धुरिका बार-बार आवे - जावे
प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष की साक्षी बारगी
जितना मूँदे नयन अश्रु बन ढलके सारे
रोरव बीती हर बात मन साथी पहचाने
दाहक लागे जब दृष्टि का अंतर कोर झाँके
थके - हारे कदम भी तब बोझिल लागे
धुंधलक का आश्रय घर ठिकाना बन जावे
परछाई भी पल की बात कल की कहे जावे
मेरा चित्त अब क्या जाने बस तेरी अभिलाषे
मेरे झूठे तर्क तुम्हारे उजले सत्य की सारे

बहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द रविवार 25 जनवरी , 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंवाह
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर सृजन
जवाब देंहटाएंवाह!!!
आप सबका स्वागत और आभार 🙏
जवाब देंहटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंमन के भाव को शब्द दे दिए आपने ...
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