हर हार को जीत का रुप दे देती हो
जितनी सहजता से तुम सबका ध्यान रख लेती हो
उतनी सहजता की मांग है , अपने खोए सपनों को पूरा करो
रास्ते पर चलते समय लोग क्या सोचेंगे , क्या सोच रहे है
मेरी बहना ! तुम्हारा औचित्य नहीं , तुम उन्मुक्तता की
रचना शांति से द्वार पर चौक पूरिती , उतनी ही लयबद्ध
भावमग्न समर्पित रहो , क्योंकि ये रास्ते तुम्हारे अपने है
तुम्हारी आँखों में पले तुम्हारे सुंदर सपने है ।
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धीरे - धीरे ही सही मैं अपने सपने बुन रही है
ठीक बिल्कुल वैसे ही जैसे काढ़ी थी मैंने अपनी शालू
फुलकारियों के रंगीन टाँकों से जिंदगी को बाँध रही हूँ
कुछ बेपरवाही मेरे हिस्से आई है अभी , जो पहले से थी
उसकी हवा में बैठी हौंले खुशी मनाती हूँ
इस बायोस्कोप की दुनिया में अपने किरदार को दिलोजान से
निभाती मंच से चली जाती हूँ
सपनों की फूलदार तश्तरियाँ टूटी पर
मैनें फेंका नहीं , क्यों भाई , अजी क्यों कबाड़ बढ़ाती हो ?
क्यों इस इस छोटे से कमरे को लाचार बनाती हो ?
अरे , भाई ! क्यों न ? सपने है मेरे अपने है मेरे
टूटे ही सही , हिम्मत रखते है आँखो में पलते है
रात की झिलमिल तारिकों से ही ये भी उतने ही प्यारे चंचल
बेकार बेचार या लाचार नहीं
शायद तुमने ठीक से देखा ही नहीं
तुम आर्ट गैलरी में जिस गुलदान की
तारीफ कर रहे थे टूटी काँच ही तो थी
मेरे सपनों की जिजीविषा की चाह ही तो थी ।

सुंदर , भावपूर्ण अभिव्यक्ति।
जवाब देंहटाएंसादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार २६ मई २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
धन्यवाद श्वेता जी !
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