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संदेश

पारिजात

सुबह भोर उठती है

सुबह  भोर  उठती  है सर्दी - गरमी  चाहे  जैसे  दिन  हो खाने  बनाने बर्तन  माँज कपड़े धोती झाडू   ले  बहुराती  आंगन पोछा  मार  फर्श  चमकाती कोनों - कोनों का  रखती ध्यान समय  की  चौकसी  में पूरा  करती  सारे  प्रबंध  रखती  सबकी  पसंद - नापसंद  का  ध्यान  भक्ति  की  भावना  में  डूबी  करती  ईश आराधन

बच्चों के लिए

👉  बाँकी बाँकी धूप   

पृथिवीसूक्त

सत्यं  बृहदृतमुग्रं  दीक्षा  तपो  ब्रह्म  यज्ञः  पृथिवीं  धारयन्ति । सा  नो  भूतस्य  भव्यस्य  पत्न्युरुं  लोकं  पृथिवी  नः ।।  संदर्भ -  अथर्ववेद  12 वाँ  काण्ड  प्रथम  सूक्त   दृष्टा ऋषि  अथर्वा   देवी  भूमि  ।

फेरीवाला और नन्हीं गुडियाँ

फेरी   वाला     बेचता   सामान नन्हीं   -    नन्हीं     गुड़ियाँ उसकी    बाबुल    की     मेहमान     साँवरी     गोरी     पहने   लाल गुलाबी    केसरिया    पीला   नीला हरा   धानी     घाघरा  -   चोली

योग और आप

खुश  रहिए  खुश  रहेंगे  तो  नकरात्मक  नेगेटिव  एनर्जी   दूर  होगी  और  आपके  भीतर  और  बाहर  की  दुनिया  में  एक  खुशमिज़ाज पाॅजिटिव  एनर्जी  का  घेरा  तैयार  होगा  जो  आपके  मेंटल हेल्थ  को  संतुलित  बनाए  रखने  में  मददगार  होगा  और  आपकी  शारीरिक कार्य  करने  की  क्षमता  में  भी  एक  खास  स्फूर्ति   दिखाई  देगी ।

पतझड़ का पत्ता

हवा का बहाव भरा झोंका टहिनयों से झरते पीले सूखे पते मरते नही है , तुम रोना मत उन्हें यूँ देख न खुद को किसी उदासी में डुबोना न उन्मलान होना , क्या तुम जानते हो ये टूटते पत्ते कपोल से पल्लव कोमल थे सुरमई लाल फिर होते - होते धानी पहने चोला हरित बारिश में झूम - झूमकर भीगे है 

पहाड़ी ढलान पर से

पहाड़ी  ढलान   पर   से सरकता   सांझ   का   वक्त गुलाबी  लाल  से  सुरमाई बादल सूरज  का   गोलाकार   रुप प्रत्यक्ष  सीधे   अब  जाते - जाते ज्यों  आँखें  मीचे  गीत  कोई  पहाड़ी  गाता  धुन  वो  जीवन की   सुनाता    बंद  तरानों को  बरसो  छेड़े  कोई  अपना याद  आता   अग्नि  की  ऊष्म पोरे  -  मिलकर  बोले   साँवरे यहीं  कही  बंसी  बजाता । 👉  कनेर

राष्ट्रीय ई पुस्तकालय से

राष्ट्रीय-e पुस्तकालय  👉 डाॅ० ए० पी० जे० अब्दुल कलाम   

शरद की मीठी गुनगुनी धूप

शरद की मीठी गुनगुनी धूप  एक आँगन की याद दिलाती है खिली हुई धूप  ऊन के गोले और तेजी सी चलती हुई सिलाईयाँ दादी नानी माँ बुआ बेटी चाची बड़ीमम्मी और भाभी सब साथ संग मेरे पड़ोसवाली सहेली पूरी भरी गोष्ठी लगते हुनर के पैबंद  रंगीन धागों से तैयार  क्रोशिया की झालर

इबादत जो देखी है

अपलक नयन तीरे एक अकूल तट विमल    सपतरंग सप्तपर्ण प्रतिबिंब खिलते शतदल कमल फैला हुआ विस्तृत क्षितिज  ठन गई है बात खुदा से

विश्व में अटल सत्य के चिरवास का .!

ओ !  इतिहास   की  घड़ियाँ  चुप   खड़ा   निस्तब्ध  क्या  तूने  पहने  ली  बेड़ियाँ  अचंभा  में  पड़ा शून्य  को  तकता निर्जन  में  अकेला  जर्जर  वृध्द  ? परिवर्तन  की  आंधियाँ बदल  देती  है  कितना  कुछ

मीठी बारिश

अम्बर   तले    छाँव   नील    गगन   में  बादल    गुजरे    ,   मेरी    छोटी    गुड़िया  प्यारी     करे    देख    उन्हें    इशारा  बताओ    तो    मम्मी    जरा    इनमें  कौन    छिपा  ?   किस   की   है   रुई    सी     मुलायम    सवारी  कौन     सवार    होकर    इन ण धीमी -  धीमी   गाड़ियों   से   जाता  है ?   वह     किधर   ,   कहाँ    जाता   ?  क्या     वो     हमको    झाँकता   है  ?  हमसे    मिलने    को    वो    क्यों    नहीं  नीचे    आ...

जब सफर में ...

शुरु  - शुरु  में  थोड़ा  मुश्किल  था  पर  मन  था  शुरुआत  हो  ही  गई । हालिक  अभी भी  झिझक  गई  नही  है  ,  यह  मन का  अजीब  द्वंद्व  है  जहाँ  इसे  नयी  दिशाओं  की  तलाश  भी  है  और   एक  तरफ   नहीं   की  जकड़न  से   बंधा  बार  -  बार   पीछे  को  खींचा  चला  जाता  है  ,  पर  अब   जब   सफर  में   निकलने  के  लिए  पहला  कदम  रख  ही  दिया  है   तो  ठीक  है  ...  कुछ  सीखने  को  ही  मिलेगा   । मेरा  यूट्यूब  चैनल  -   Nature feel of soul  

दिवाली की रौनक तभी सफल बने

सर्द दिनों की रुहानी आहट लिए मौसम का रुख बदला है सिमटा - सिमटा दिन  गुलाबी ठंडक लिए  सूरज आसमाँ के पट पर खिलने लगे गुलाब  मंजरी पर पुलकित पुष्प

रामवृक्ष बेनीपुरी गेहूँ बनाम गुलाब निबंध

रामवृक्ष बेनीपुरी गेहूँ बनाम गुलाब निबंध गेहूँ हम खाते हैं, गुलाब सूँघते हैं। एक से शरीर की पुष्टि होती है, दूसरे से मानस तृप्‍त होता है। गेहूँ बड़ा या गुलाब? हम क्‍या चाहते हैं - पुष्‍ट शरीर या तृप्‍त मानस? या पुष्‍ट शरीर पर तृप्‍त मानस? जब मानव पृथ्‍वी पर आया, भूख लेकर। क्षुधा, क्षुधा, पिपासा, पिपासा। क्‍या खाए, क्‍या पिए? माँ के स्‍तनों को निचोड़ा, वृक्षों को झकझोरा, कीट-पतंग, पशु-पक्षी - कुछ न छुट पाए उससे !

तमाशा

अम्बर सा रंग , धरती मेरी धानी  सागर का बहता पानी ,  देती मोती सपनों को आकार कोरे मन की ये कोरी सी कहानी कहता क्या रंग , कहता है क्या पानी उड़ने की जो दिल - ए - तमन्ना    ये मन ने है ठानी 

जनपथ बहुराती

संकेत संकेतक कभी शुभ समाचार की कभी किसी अनहोनी अनिष्ट की दोनों ही रहस्य भविष्य के गर्भ में छिपे है जिसको उस त्रिकालदर्शी के सिवा मैंने क्या किसी ने भी नहीं देखा , तो सुख- दुख के तराजू बराबर है दिन के बाद रात, रात के बाद दिन कोई बाधा नहीं , फिर अस्वीकार कैसा

हम सब एक परिवार है

जरुरी नहीं की हर गीत लिखा जाए  कुछ गीत बस यूँही गुनगुना लिया जाए खुली हवा में खुले जीवन के साथ  हर बाधा से मुक्त अविमुक्त  स्वतंत्र खग की उड़ान  अनन्त व्योम में विचरते बादलों की भाँति बिना व्यक्त किए व्यक्त कर देने की बात  हवाओं की शीतल छाँह में घुलते शब्द

चलते चलो

देख आसमान को और उठ खड़ा हो  चलते चलो उसके साथ  मुश्किलों में भी जीना सीखो बनते - मिटते नित ये बादल जीवन की सच्चाई है आज है तो कल नहीं वही याद रहे जो सूखे दिन में आ करुण बरस गए  सूखी तलहटी में जीवन को भर गए  फूल खिले फसलें लहरायी

सेवाभाव पथ लक्ष्य यहीं

वक्त के साथ बदलता अदब हर साँचे में ढलना  कदम से कदम मिलाकर चलना भीड़ की मक्खी बन जाना आसान है , पर खुद को खुद में रहकर तराशना थोड़ा   मुश्किल है , अपनी गलतियों को समझना और सुधारना  सुधार की अपेक्षा तो हम सदैव दूसरों से ही रखते है

अपनी सोई हुई चेतना को जगाओ

हीन  ,  मगर  नहीं  किसने  कहा  कि  तुम  हीन  हो  और  अगर  कोई  अपने  में  कहता  है  तो  कह  ले  ,  किसी के कहने  मात्र  से  तो  कोई   हीन  नहीं  हो  जाता  है , हीन  तो  तुम  तब  कहलाओगे   जबकि  तुम  अपने  को  हीन  मानोगे  , अपने  भीतर  छिपे  आत्मविश्वास  और   रचनात्मिका  शक्ति को जब  तक  तुम  संबल  न   दोगे  ,  तब  तक   प्रभु  भी  कुछ  नहीं  कर  सकते  ,  क्योंकि   ईश्वर  की   मदद   पाने  के  लिए  पहले  हमें   अपने-आप   से   प्रयास  करना  पड़ता  है  ।