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गीता का सार्वभौमिक महत्व और उसमें वर्णित गुरुपद की महत्ता

भगवद्गीता का उपदेश किसी एक विचारक या विचारकों के किसी एक वर्ग द्वारा सोची गई प्रवृत्ति या उभरती हुई किसी अधिविघक प्रणाली के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है, यह उपदेश एक ऐसी परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो मानवता में विश्वास करती ह  गीता भगवान श्रीकृष्ण की विमलवाणी के प्रवाह में एक ऐसा उपदेश है, जिसकी सार्वभौमिकता अक्षुण्ण है और जो धर्म के सच्चे रूप में मानव धर्म को प्रतिबिम्बित करता है। 

जो जीवन को सार्थक बनाता है, उसे अमृत्व के आनंद से जोड़ने के लिए प्रतिबध्द है। गीता का प्रतिपाघ विषय संपूर्ण वेदों उपनिषदों का सार है। जो जीवन के प्रश्नों के उत्तरों को अपने में समाहित किये हुए हैं। गीता का प्रत्येक कथन मानव मात्र के कल्याण की कुंजी है। गीता व्यक्ति को कर्म में निष्कामता का भाव रखते हुए सुख - दुख, हार - जीत, लाभ - हानि इन सभी द्वंद्वग्रस्त  परिस्थितियो में समत्व अपनाते हुए सतत विकासपथ की ओर गतिमान रहने को प्रेरणा देती है, जो व्यष्टि और समष्टि दोनों के कल्याण से प्रेरित होती है। गीता एक ऐसा सहारा है जो घोर अज्ञान रूपी अंधकार में भटकते हुए मनुष्य की उंगली थाम उसे प्रज्ञा प्रकाश की ओर ले जाती है। इस प्रकार आत्मा में परमात्मा का निवास होता है - का यह कथन अनभिज्ञ न होकर अनुभूत होता हुआ प्रतीत होता है।

  गीता का दूसरा अध्याय सांख्य योग के नाम से जाना जाता है। जिसमें अर्जुन  अपने स्वजनों के विरुद्ध  युद्धभूमि में उन पर शस्त्रों से प्रहार कर  उन्हें चोट पहुंचाने और कुल के विनाश आदि के भय से दुखी हो जाते हैं। व्याकुल अर्जुन  शिष्य रूप में भगवान श्रीकृष्ण के शरणागत होकर स्वयं को उनके प्रति पूर्ण रूप से समर्पित कर देते हैं और उनके द्वारा निर्देशित मार्ग को ही अपने लिए श्रेयस्कर मानते  हैं। इस दृश्य में एक ओर तो मनुष्य के मन में रहने वाला मोह दिखाई देता है। जो हमें अपनी कर्तव्य से पीछे धकेलता  है, वहीं दूसरी ओर गुरु की महत्ता  को स्पष्ट किया गया है। जो कच्ची   मिट्टी  के समान अपने शिष्य को ज्ञानरूपी अग्नि में तपाकर  परिपक्व बना देता  है, जो अज्ञान को दूर कर अन्तर्मन में ज्ञानरूपी दीपक को आलोकित कर अपने अंदर के सत् तत्व से परिचित करा देता है।जब अर्जुन  अज्ञानता के कारण कहता है कि , मैं भीरु नहीं हूं मैं संघर्ष से नहीं डरता, मारने से डरता हूं। यह कथन मानव मन की उस स्थिति का प्रतीक है, जो अभिमान में रत अल्प ज्ञान होने पर भी स्वयं को बड़ा ज्ञानी होने के रूप में देखती है, लेकिन गुरु इस अज्ञान को दूर करके शिष्य का मार्गदर्शन करता है, पर शर्त यह है कि शिष्य स्वयं को पूर्ण रूप से अपने गुरु के प्रति समर्पित कर दे।   

 भगवान श्रीकृष्ण गुरुपद धारण कर अपनी शरण में आए अज्ञान से विह्वल अपने शिष्य अर्जुन के मन को विश्रांति देते हुए उन्हें  कर्म की महत्ता का, ज्ञान के प्रकाश का, भक्ति की शक्ति का, परमात्मा के शाश्वत स्वरूप का बोध कराते हुए कहते हैं -

अच्छेघोयम्दाह्योयमक्लेघोऽशोष्य एव च।

नित्य सर्वगतः स्थानुरचलोऽयं सनातन।।

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नैनं छिन्दति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

न चैनं क्लेदेयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।।

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 य एनं वेत्ति हन्तरं यचैन्मन्यते हतम्।

उभौ तू न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।।

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वंशासि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृहणीत नरोऽपराणि।

तथा शरीर विहाय जीर्णानि नन्यानि संयाति नवानि देहि।।

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  इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अपने शिष्य अर्जुन को उनके पथ का बोध कराया । जो ज्ञान के स्वर्णिम प्रकाश से अज्ञानता के अंधकार का नाश कर परमानंद को देने वाला था। गीता  का यह दूसरा अध्याय गुरु - शिष्य परंपरा का अत्यंत सुंदर स्वरूप प्रस्तुत करता है। इसके अतिरिक्त गीता के अन्य अध्यायों में भी गुरु की महत्ता प्रतिपादित की गयी है। इसी  से प्रभावित होकर कबीर ने कहा होगा कि -

  गुरु गोविंद दाऊ खड़े , काकै लागौ पाए  । 

 बलिहारी गुरु आपणौ , गोविंद दियो बताए ।।

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  गुरु हमारे ज्ञानचक्षु को खोलने वाला है। इसलिए उन महान गुरुओं के प्रति एक शिष्य के रूप में हमारा समर्पण आवश्यक है।

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