कभी तुमसे इंकार
कोरे कागज की निःशब्द
भाषा टकटकी
बाँधे कुछ लिखने को कहती है
सुख - दुख , आशा - निराशा
राग - विराग , तृष्णा और तोष
वीर ओज सहृदय माधुर्य
प्रेमभाव पल्लवित ऋतुनय
नदी धारा सी बहे निकले
सुन लेती बिन आक्षेप
सही - गलत हर बात
जब न सुने कोई तुम्हारी बात
लिख देना कागज पर वे न करेंगे
कभी तुमसे इंकार
काग़ज़ ने न जाने कितने दिलों को सुकून से भर दिया है, जब उनका सुख-दुख अपनी छाती पर धर लिया है
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