जो मन न करे तो क्या करे
इस तंगहाल जिंदगी की ओर ध्यान
किस कदर ले जाए ,
हालातों का मारा
बेवजह का यात्री
वर्तमान की सच्चाईयाँ - वह
फिर भी तो नहीं है मुझे यूँ हार मानना
बंद कोष्ठक मैं नहीं , मुझको तो है बस चलते जाना
और चलते जाना ... उम्मीद की जिंदा बस्ती में ... मुकम्मल
खुदा से मिलने का अशराना लिये हुए पथ पर बढ़ते जाना ।

बढ़ते जाना,चलना ही ज़िंदगी है...
जवाब देंहटाएंसादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार २३ जून २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
सुंदर
जवाब देंहटाएंवंदन