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पारिजात

अनेकों शुभकामनाएँ वेणु

वेणु अपनी गति की चाल तेज कर पूरे दमखम के साथ रोड़ के किनारे किनारे चली जा रही है । हम्म…काफी देर जो हो गई है । पहले दिन ही लेट कैसे चलेगा ….सोचती हुई अपने पैरों से रास्ते को और जल्दी जल्दी नापने लग जाती है । जैसे कि उसे किसी मैराथन में दौड़ लगानी है , क्या लगा रही है , हालाकि इस रास्ते का भी उसे लिहाज रखना है अतः अब जैसे भी हो किसी तरह समय पर पहुँचना है । ये लो संगीत नाट्य कला अकादमी का केंद्र नजर आ गया और जिसे देख वेणु को कुछ

आश्वासन आ गया है और एक अनकहा गर्व भी उसके चेहरे की मुस्कान से सहज ही झलक आया है । वह केंद्र में प्रवेश कर केंद्र प्रभारी विनीतामोहन के कक्ष के समीप  जाकर अंदर आने की आज्ञा लेती है , विनीता जी    सहर्ष    उसे   देख अंदर बुलाती हुए बैठने को कहती हुई , “ आइए वेणु जी हम आप ही का इंतजार कर रहे थे । आप अपनी पहली कक्षा के लिए तैयार है ना ʼʼ जी बिल्कुल , वेणु एक मीठी सी स्मित मुस्कान लाती हुई बोलती है । विनीता जी वेणु  की स्फूर्ति और चेहरे पर खिल आई उमंग को देखकर एक मुस्कान अपनी जोड़ देती है और वेणु को उसकी कक्षा तक ले चलती है । हम्म …! आ ही गई वेणु आज अपनी उस भूली हुई सितार से मिलने जिसके सुर बरसो पहले कही अहिस्ता से मौन कर रख दिए गए थे । विवाह , प्राइवेट नौकरी , घर परिवार रिश्तेनाते बालबच्चों में उलझी वेणु जब इन सबसे निवृत्त एकाकी हो गई या अवांछित हस्ताक्षेप शायद जिससे डर वो जीवन के इस मोड़ पर खुद ही सिमटने को विवशता मान इन दुनियावी रिश्तों से दूर हो जाना चाहती है तो बार - बार उसे काल का गाल याद आ जाता है । पर आज काल का गाल याद नहीं आने वाला जब सब अपनी अपनी भूमिका में ठीक है तो खुद को वो कब तक खाली दिमाग शैतान का घर खापेयेगी । आज वो अपनी प्रवृत्ति सुरसाधना संगीत की देवी से फिर मिलेगी इस वृध्दावस्था के सूने एकाकीपन को सुरों के सुरीले साथ के साथ जीये की । श्रीमती वेणु … जी आप तैयार हो जाये । आज से एकाकीपन के तार नहीं , इन विघार्थीयों के बीच सितार का मधुर सुरीला तार छेड़ने के लिए … अनेकों शुभकामनाएँ वेणु जीवन को फिर से जीने के लिए ..खुलकर जीने के लिए । सा रे गा मा पा धा नि …। आज दिल की बात जो हुक सी दबी होने के कारण सालती थी चुभती थी , वो बात वेणु ने आज कहे भी ली और सुन भी ली ; तो वेणु जी आप अपनी कक्षा आरंभ कीजिए , कहती हुई विनीता जी चली जाती है ।


टिप्पणियाँ

  1. मैं वेणु की बेचैनी महसूस कर सकता हूँ, क्योंकि हर नया सफर ऐसा ही लगता है। मुझे उसकी वो हिम्मत बहुत पसंद आई, जब वो सारे बोझों से निकलकर फिर से अपने सुरों से मिलती है। मैं देखता हूँ कि उम्र कभी जुनून को रोक नहीं पाती, बस सही वक्त चाहिए।

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