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बदरा

जहाँ अभी कजरी के बोल तीखे - मीठे गाये जाते है
सावन के झूले , हरियल की मनुहार लागी है 
इठलाता - बलखाता वह सरल सलोना श्रृंगार 
भींगता मननयन आज भी है उस करुण रस में
ज्यों दूब भींगती प्रतीक्षा की लंबी अवधि वार
गोरी का सजान है अभी उस पार ...

वारे बदरा काले बदरा बरसो मेरे द्वारे
मेरे द्वारे आये आज मेरे मन के सरताज
बरसो नेह बनकर के , कम जो पड़े तो मांग लो 
नीर मेरे नयन से , भरभर के आज द्वारे बरसो
बरस हजारों बरसो , भींग जाए सारी अवधि
ताप वे विरह का , आज साजन अपने गाँव को लौटा
तुम भी बौछार बन आओ बदरा मेघ मल्हार गाओ बदरा


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