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शिवसंकल्पसूक्त

शुक्ल यजुर्वेद के 34वें अध्याय में शिवसंकल्पसूक्त प्राप्त होता है।  इस मंत्र के दृष्टा ऋषि याज्ञवल्क्य और  देवता मन है। शिवसंकल्पसूक्त की प्रेरणा मन को एकाग्रचित्त, संयमी और शुभसंकल्पों से युक्त बनाने की है। मन मानव के कर्मों का प्रेरक है। वहीं हमारे उन्नति और अवन्नति का कारण बनता है। हमारा मन ही समग्र ज्ञान का स्रोत होता है।  अतः इस अत्यंत तेज़वान और गतिशील मन को सम्यक गति से गम्य बनाए रखने के लिए उत्तम संकल्पों  वाला होना अपरिहार्य 
रूप से आवश्यक है।  

यज्ज्ग्रतो दूरमुदैति सुप्तस्य तथैवेति।

 दूरमङ्गम ज्योतिषं ज्योतिरेकं, तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।।

सन्दर्भ - प्रस्तुत सुमधुर मंत्र शुक्ल यजुर्वेदीय शाखा के 34 वें अध्याय की प्रथम कंडिका से उद्धृत है तथा इस के दृष्टा ऋषि याज्ञवल्क्य एवं देवता मन हैं।

हिंदी अर्थ - जो दिव्य (दैवीय शक्ति से युक्त) मन जाग्रत अवस्था में (अपनी चंचलता के कारण) दूर चला जाता है। सोते हुए वहीं मन वापस आ जाता है , वह हमारा मन शुभ संकल्प वाला हो।

व्याख्या - प्रस्तुत मंत्र में मानव मन की प्रकृति उसका स्वरूप उसकी चंचलता पर प्रकाश डाला गया है। यह मन वायु की गति से भी तेज गति वाला है। जो अपनी इच्छानुरूप किसी भी दिशा में हमको ले जा सकते हैं। इस मन को जब हम एकाग्रचित्त होकर ध्यानावस्था में देखने का प्रयास करते हैं, तब वह मन अपने ज्योतिर्मय स्वरूप को प्रकट करता है। ऐसा हमारा मन शिव (कल्याणकारी) भावों, विचार वाला बने हमें अलग-अलग मार्गों पर ले जाकर हमें दुविधा में न डाले ,  अपितु हमारा ध्यान हमारे लक्ष्य की ओर एकाग्रचित्त करे, हमें अपने लक्ष्य की प्राप्ति में विजयी बनाए ।

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येन कर्मण्यपसे मनुष्यो, यज्ञे कृण्वन्ति विदेशु धीराः।

यदपूर्व यक्षमन्तः प्रजानां, तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।।

सन्दर्भ - प्रस्तुत सुमधुर मंत्र शुक्ल यजुर्वेदीय शाखा के 34 वें अध्याय की द्वितीय कंडिका से अवतरित है। इस मंत्र के दृष्टा ऋषि याज्ञवल्क्य और देवता मन हैं।

हिन्दी का अर्थ - जिसके द्वारा कर्मनिष्ठ मेधावी तथा धीर लोग, यज्ञ में एवं यज्ञ के लिए विधि - विधान से कर्म करते हैं। जो प्रजाओं के अंतर्भाग में सर्वप्रथम रूप में पूज्य हैं। वह मेरा मन शुभ - संकल्पों वाला हो जाये।

व्याख्या - प्रस्तुत सुमधुर मंत्र में मन को सर्व - कर्म के निष्पादन में एक प्रेरक शक्ति  स्रोत बताया गया है। जो मन हमारी सभी क्रिया-कलापों और विचारों का सूत्रधार है। उसके लिए यह नितांत आवश्यक है कि वह हमारा मन  शुभ (कल्याण) से प्रेरित हो। हमारे मनीषियों द्वारा प्राचीन काल में मन के विषय में यह बात प्रतिपादित की गई है, जो आज के आधुनिक युग में भी सभी बाधाओं को पार करते हुए मान्य है ।  जीवंत है। प्रासंगिक है ।

*यज्ञ - हमारे द्वारा किया गया प्रत्येक सत्कर्म एवं सत्कर्म करने की प्रेरणा वास्तव में यज्ञ का हीं एक प्रकार - कर्म - यज्ञ है। एक कर्मनिष्ठ एवं सतत उघमशील समाज के निर्माण हेतु यह आवश्यक है कि हम सभी इस कर्म यज्ञ में अपना योगदान सुनिश्चित करें।

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यत्प्रज्ञानमु एत चेत धृतिश्च, यज्ज्योसिंत्रमृ तं।

यस्मान्न ऋते किञ्चिन कर्म क्रियते, तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।।

सन्दर्भ - प्रस्तुत सल्ललित मंत्र शुक्ल यजुर्वेदीय शाखा के 34वें अध्याय के शिवसंकल्पसूक्त की तृतीय कंडिका से प्रस्तुत है। इस मंत्र का दृष्टा ऋषि याज्ञवल्क्य और देवता मन है।

हिंदी अर्थ - जो उत्कृष्ट ज्ञान का जनक है और जो अपकृष्ट ज्ञान का जनक  है, जो धैर्य का आधार स्वरूप है और जो हमारे अंतःकरण में ज्योतिस्वरूप में विघमान है, वह मेरा मन शुभ संकल्पों वाला हो जाये।

व्याख्या - प्रस्तुत सुल्लित मंत्र में मन को एक प्रेरक शक्ति स्रोत के रूप में बताया गया है। अर्थात हम अपने मन से ही प्रेरित होकर कोई कार्य करते हैं। हमारे शरीर संचालन में समस्त ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों के मध्य समन्वय स्थापित करने में भी हमारे मन की ही भूमिका पद का निर्वहन करता है। अस्तु हमारा मन ही है जब हमारी अभिप्रेरक शक्ति है तो यह नितांत आवश्यक है कि यह प्रेरक शक्ति शिवमय ( अर्थात - कल्याणकारी ) हो ताकि हम सत-असत् के बीच का अंतर विवेक प्राप्त कर सकें। आपने मन के तेजमयी प्रकाश से प्रकाशित हो सके।

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