भाव भी मेरा अभाव भी मेरा
जिस दिन इन सबको त्याग दूँगी
हर बंधन से मुक्त
स्वयं से उन्मुक्त हो
असीम अंतहीन परम चैतन्य से
मिल अगाध आनंद - कुँज को
पाऊँगी अपनी सितार में मिला उसे
मधुर राग जगजीवन विश्राम का
सबको सुनाऊँगी
रहेगा न कपट का कलुष
न स्वार्थ मोह का आवरण
शुध्द बुध्द मन के आले में
परमज्योति प्रकाश अनवरत
अनन्त हो अहर्निश तमघन हरेगा ।
हर निराशा को वो
अपनी आशा से भरेगा
काटके हरेक दीवार को
जिस दिन स्वयं स्वयं से
प्रथम बार मिलेगा ।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
आप सभी सुधी पाठक जनों के सुझावों / प्रतिक्रियों का हार्दिक स्वागत व अभिनंदन है ।