माटी के मोल

एक बालपन कपोल

दंतविहीन जरा हुआ 

प्रथम क्रीड़ा तोतली

अब मजदूरी की हंसी

प्रकृति अद्भुत 

द्रवित हृदय विदारा

विश्रांत भी उसी ममतामय छाँव तले

माता कहे पुकारा मूंद नयन जब तुम्हें पुकारा

सदैव उर में साक्षात तुमको पाया

साहस का न मुझमें गौरव 

धूल धूसरित पिघला अर्णव

माटी के मोल अमोल हुआ। 

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