मंजिल तुम हमारी



मायने रखती है तुम्हारी खुद की खुशी 

तुम्हारी  अप्रतिबंधित मुस्कान  उफ , खिलखिलाकर  हँसना 

जरुरत है जिंदगी की बंदगी

उतनी  ही  जितनी मौत जीवन को स्वीकार्य है

पाथर तो  नहीं , पाथर पर भी

हरी काई है ,  फर्न  मौजूद जिंदगी दुर्गम में भी  साथ निभाती  है

अभी बंद  नहीं  हुए   प्रकाश स्त्रोत

घने  अंधकार को थी  सबसे  ज्यादा चाहा सुबह की

मैं  खूब  रोया पर  अंतर में  विधना तुमको ही  मैंने  हरदम पाया

जग  की  रीत  पुरानी , आना - जाना  और  मंजिल तुम हमारी ।




टिप्पणियाँ

  1. सच कहु, आपकी ये रचना पढ़कर दिल में एक अजीब सी शांति और हलचल दोनों साथ में आती हैं। आपने खुशी और दर्द को जिस तरह साथ रखा, वो बहुत असली लगता है। मुझे ये भी अच्छा लगा कि आपने कठिन हालात में भी जीवन की मौजूदगी को महसूस किया।

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  2. ज़रूरत है ज़िंदगी की बंदगी। बहुत सही कहा आपने प्रिया जी।

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