हँसी की तलाश लौट आओ
भीतर है खोज लाओ
मुढ़ भाव को छोड़कर
तनिक मार्ग पर तो आओ
कुछ बात है दिल की बेझिझक
कह जाओ , सुनेंगे चुपचाप
घंटें - दो घंटे चाहे जितनी लंबी हो बात
दो शब्द या केवल मौन कुछ भी
प्रश्न नहीं खड़े करेंगे ,
स्वत्व बोध की नव परिभाषा गढेंगे
तुम मुस्कुराना , हँसना - रोना
कदमों को लंबे नापना
पास से लेकर दूर तक
व्योम की नीलिमा से
मगरुर सागर के छोह तले
जीवन कभी - कहीं बेसुध नहीं है
जीने की चाह कृष्ण से जुड़ी है ।
बहुत सुंदर रचना है यह आपकी प्रिया जी
जवाब देंहटाएंधन्यवाद आदरणीय
जवाब देंहटाएंसोच जुड़ जाती है आध्यात्म से जो सार्थक हो जाता है जीवन ...
जवाब देंहटाएंस्वागत और आभार आदरणीय।
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