चंचलता चित्त की चमक सुहाती
ज्योतिपुँज की गहराई में डूबी
केसरी कुँज श्वेतमय पारिजात प्रिय
सर्मिपत हो जाना पूर्ण रुप में
खुले दिल से अपनी सुरभि को
लहलहाना , क्षुब्ध मन को मिले जो विश्राम
पथिक की आशा - निराशा अंतर्द्वंद को आराम
स्मृतियों के कण-कण में व्यापे जाते मेरे तुम
व्यक्त - अव्यक्त के धूमकेतु बन लुक - छिप
अंजान ही गीत गाते समकेन के दीप जलाते
पथ से फिर न होगा लौट आना
अब पथ पर है अपना पूरा नेह लुटाना
जैसे , तुम कहते प्रिय पारिजात
लो वत्स , लो सखा , यात्री मेरे , अज्ञात ,
मेरे जनम - जनम के सहचर मेरे साथ
ये पुष्प ले लो

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