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संदेश

पारिजात

एक बूँद सुहानी

१  असंभावित   मौन   से   निकलकर  बारिश   की   टपटप   में    घुलना   है । चुपचाप    भीगी    हरी   घास   पर    चलना   है मन   के   सारे   कलुष   को   इस   बारिश   में   धुलना  है 

वृंदावन तट रेनू ... मन से जो पास हो

वृंदावन तट रेनू ... मन से जो पास हो । वहाँ बन्धन तुच्छ हो जाते है । सीमाएँ भी तभी तक रहती है जब तक हृदय कुलष से छूटकर प्रेमभाव की वृहत्तर भूमि प्राप्त नहीं कर लेता है और त्याग व करुणा की मृदुल हितभूमि से जब उसका संबंध

बचपन से अब तक

दो पाटों के बीच आलोपित बचपन है कभी तो बड़े और कभी बच्चे हो तुम कितनी धूप आँगन में आई मेघ भी झमाझम सावन में बरसे क्रम न टूटा तुम्हारे आने - जाने का जनम से लेकर मरने तक आँगन में खिलते रहे सुवासित पुष्प गर काँटे थे

नवजागरण का यह मंगलप्रात

प्रात किरणों का धरा पर शुभागमन रात की निस्तब्धता को दूर करे खगकलरव ने दे दी मधुर तान  मंदिर में बजता घंट निनाद  सरल सुषमित भोर में नवजागरण का यह मंगलप्रात

साथ अनंतर है

बंधनों   में   रहकर   भी   बंधनों   से   आगे    निकल जन्म  -   जन्मांतर   से    परे    केवल   एक   आशा मृत्यु   का    फिर    भय    क्या   ?     जब    यह    साथ    है     चिर     शाश्वत     सत्य     ,    क्यों    सुबके    डर  से क्या     बदलते    मौसम    को    बदलते    देख    रोते   हो

शब्द और भाव

शब्द  और  भाव  का  साथ  जैसे   सूर्य  से   तेजस्वी   मुख   पे दमकती  चंद्रबिंदी  की   शुभा शब्द   और  भाव  का   सहवास  जैसे   पूस   की  रात   में   जलती  आग शब्द  और   भाव   की   सौगात  जैसे  आत्मा   और   परमात्मा   का   चिर   साथ  शब्द   और    भाव   का   प्रकाश   जैसे   मंदिर   में   जलता   दीपप्रकाश

अंतर चुप रहने का

एक   -     कई  बार   बस   तुम   इसलिए   हारे कि   तुम   चुप   बने   रहे सही - गलत   अच्छे -  बुरे   के   प्रति   कुछ   इंगित  नहीं  किया निरीह   विरक्त  पाषाण  संवेदना - सहवेदना  से  अलग -  थलग खुद  को   कैद   में  बंद   कर  धृतराष्ट्र -  गाँधारी  हो   गए  तुम ! तुम्हारा  पश्चाताप   ही   तुम्हारी   विकट  सजा  हुई  ।

एक नदी हो जाओ !

लिखने   को   शब्द   नहीं   ,  भावों   की   एक  मुस्कुराहट   ले   लो । अगर  ऐतराज  न  हो  कोई   तो ,  तमाम   दुख  -  दर्द   के  पार जिंदगी  को   जिंदगी   के  असल   नजरिए   की   निगाह  से   झाँक 

एक मिट्टी एक स्वर

रुँधी   आवाज   बंद   थी   कई   दिनों   से एक   लंबे   अर्से   को   पार    करती वक्त    के    काँटें   को   चुनौती   देती एक   सूखे  ,   रोके   कंठ  और   दरकते   हिये   की   कहानी अकेले   मेले   को   तूफां   से   खींच   शोरगुल   कर   देना   का विप्लव  के  मायने  दूसरे  , जीवन  को  फिर  एक  बार  जीने को सहजता ,  सौहार्द  ,  विनत  समरसता  और   उम्मीद  के  सवेरे

अवनी दिवसालोक

अवनी   का    दिवसालोक शोभा    सुंदर    विस्तृत   अंतर -  आलोक श्रुति   पाठ    प्रार्थना   के   रव   भर   लायी पक्षियों    के    मिस    बोल    में    तुमुल   स्वर   मिलाए प्रभाती   की   पावनबेला   मंगलगीत   घर - घर   गाए नदियों   का   जल   निरंतर    पथ   की   पगडंडियाँ   जैसे   चलती   सतत  जाए  आते -  जाते   पथिक    में    तू   ना   अनजान 

वाणी तू गाए ... मन गीत फिर गुनगुनाए

वाणी   तू    गई    टूट    शब्द   गए   हमसे   रुठ अर्थ -  भाव    बिसर   गए    ज्यों   किहीं   दूर खोते    से     अपने     नेत्र    सजल    चुप    है उनमें     एक     मूक     गहरी     वेदना     छिपी सुबक     रही      अंतर्मन     की     विवर्ण     दशा मन    हारे    ना      शब्द   -   शक्ति     यही    वर    दे

चुपचाप बहती है एक नदी

जहाँ   मौन    के    स्वर    टूटते    हो वहाँ    एक    नदी    बहती   है  अंतर्धारा    गंगा    पवित्र   सी चट्टानों    की    चोट   ,    पाँवों    के   छालों    को    सहती   सी स्मृतियों     का      आवाह्न  -  आवाह्न  सुख    चाह    दुख   दर्द    भागी    जीवन    स्पंदन कठोर     नारियल     और    मीठा    जल  , अग्नि     ऊष्म     शुचि    संपन्न    पल  -   पल     प्रतिपल     अनवरत

पतंगें

पतंगें जलने को राजी है , दीये की लौ नहीं तो  बल्ब  हाजिर    है । जब  सच्चा संकल्प हो मन में ठना , तब तू चट्टान सा दृढ़ हो मैदान में खड़ा ना दो पग पीछे , ना दो पग आगे वर्तमान में तेरा भूत और भविष्य दोनों तेरे  साथ खड़ा जहाँ से प्रवाहित अनादि सृष्टिगंगा  क्रम दिनरात सतत चला , नवांकुर नव

अनेकों शुभकामनाएँ वेणु

वेणु अपनी गति की चाल तेज कर पूरे दमखम के साथ रोड़ के किनारे किनारे चली जा रही है । हम्म…काफी देर जो हो गई है । पहले दिन ही लेट कैसे चलेगा ….सोचती हुई अपने पैरों से रास्ते को और जल्दी जल्दी नापने लग जाती है । जैसे कि उसे किसी मैराथन में दौड़ लगानी है , क्या लगा रही है , हालाकि इस रास्ते का भी उसे लिहाज रखना है अतः अब जैसे भी हो किसी तरह समय पर पहुँचना है । ये लो संगीत नाट्य कला अकादमी का केंद्र नजर आ गया और जिसे देख वेणु को कुछ

माता के आँचल के बिखरे मोती

तेज   हवाएँ    लू   लपट   सूखे    मैदानों    में हाहाकार    प्रचण्डिका   अग्निधार     बाण उफनती    चिंगारियाँ     लौहवर्ण     सावधान  मनसा   सावधान  !   थोड़ा   सोच-विचारकर   काम   करो    जहाँ   भी    जैसे   भी    संभव  हो   सके   अपनी  धरतीमाता   की   पुकार  सुनो   बनके    जो    चारों    दिशाओं   में    गूँज    रही मजदूरों    कामगरों    बेबस   बेजुबानों   की   आह 

अभी बाकी है - एक आस एक विश्वास

अन्तश्चेतना  का   दीप   जला  है  मनमानव   ईश्वरत्व   के   आह्वान   में   विश्वास   का    दृढ़   आधार   छिपा  है  लगा   रही   है    खुली   घाटी    में    एक  मौन    विनम्र    पुकार  ,   साहस   धैर्य   बिंदु प्रकृति    माता    ने    सिखलाया  ; वह   खड़ा   है    दिशाविहीन   नहीं   जो पथविहीन     नहीं     हाँ  ,   मगर अभी    उसका   जागना   बाकी   है

चिंता नहीं चिंतन करो

चिंतन समाधान प्रस्तुत करता है । जो जीवन के हर मोड़ हर परिस्थिति में समस्याओं से कैसे निपटा जाए ? कैसे हम स्वयं को भीतर से सशक्त करे ? कैसे हम अपने जीवन को सार्थक कर सकते है ? कैसे स्वयं और दूसरों के मध्य सामंजस्य सुनिश्चित कर सकते है ? इत्यादि तमाम प्रश्नों का उत्तर है - चिंतन । चिंतन यानी किसी चीज को गहराई से समझना उसके हरेक पहलू पर व्यापक दृष्टिकोण के साथ विचार करना और यह तय करना कि यदि हम ऐसा ना करके कुछ ऐसा करे की जो प्रतिकूल परिस्थितयाँ हमारे समक्ष आयी है , क्यों ना उसे अपने अनुकूल बनाने का प्रयास करे , क्यों ना उसमें कुछ रचनात्मक खोज निकाले और क्यों न धैर्य से काम लेते हुए स्वयं को भीतर से दृढ़ बनाया जाए ।

ये नन्हीं बाल आशायें पूर्ण होंगी

पूर्णिमा    चाँद   आज   आसमाँ   पर   सजेगा  ,   धीरे  -   धीरे   बढ़कर  कई   दिनों   के   इंतजार   के   बाद  आज   चाँद   अपने   पूरे   रुप   में   फबेगा गायेंगी    गीत    मीठी   आवाजों   में   सितारों    की   महफिल   से   पूरा   समा   जब   बंधेगा माँ  अपने  बच्चे   को   लोरी   गाकर  सुलायेगी खिड़की   से   चंदा   के   दर्शन   करायेगी

उसी का ये गायन है

गीत   गा   रहा   मौसम     जीवन   में    उज्ज्वला   का   प्रकाश   पसर   रहा  है  हर    गीत    एक    गहन   को   कह   रहा   है  ,    किसी की    बात    सुनाता  ,   किसी   को    पुकार   लगाता  दिनभर   यह   गीत   मंद   स्वर   में    मधुर  तान   संग    कानों    में    गूँजता   रहता   है  ;    कुछ    कहने   को किसी    का    संदेशा    सुनाने    को     शिद्दत   के   साथ

अकेले ये दोनों पीढ़ियाँ

दो   पीढ़ियों   का  अन्तराल   है   ये विडम्बना   की    आवाज   देता    एक  तरह  से  अन्तर्मन  को  चीरता असह्य  पीड़ादायक   दर्द   है , ये   दो   पीढ़ियाँ   विवश   है   रह   रहकर   यह   दंश   सीने  पे  झेलती  है इन्होंने   शायद  खुद  सीमा  तय   कर   ली  है ये   दोनों    पीढ़ियाँ   एक   दूसरे   से    दो    हाथ   फासले   पर    खड़ी   है

सहज स्वीकार्य जीवन उत्कट स्वाभिमान

भरी   दोपहरी  मन  की  संवेदना  ठंडी   हो   जाती  है चिलचिलाती   धूप  में  अक्सर   लोगों  का कर्त्तव्य  ही   उन्हें   जिला   लेता  है  दुर्धुर्ष  रुप  है  ,   पर   अपने   में    स्वाभिमानी  , उत्कट   जीवंत   स्वीकार्य   है   उसे परिस्थिति  की  संपन्नता विपन्नता  से कभी  विचलित नहीं  हुआ  सहज   मुस्कान  सहज  आँसू   ,   यहीं   उसकी  परिभाषा वह   बन्धन   में    भी    निर्बंध    कमलवत   है